गौरेला, पेंड्रा ,मरवाही/ नूर मोहम्मद/ ब्यूरो चीफ,सर्वव्यापी
ग्रीन क्रेडिट योजना, जिसे पर्यावरण संरक्षण और हरित क्षेत्र विस्तार का मजबूत आधार बताया गया था, वही योजना मरवाही वनमंडल में कथित रूप से भ्रष्टाचार, फर्जीवाड़े और संगठित बंदरबांट का पर्याय बनती जा रही है। विभागीय एवं विश्वस्त सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले के मरवाही वनमंडल अंतर्गत मरवाही परिक्षेत्र और खोडरी क्षेत्र में स्वीकृत प्राक्कलन को दरकिनार कर करोड़ों रुपये की सरकारी राशि का खेल खेला गया है। विभागीय सूत्रों का दावा है कि यह लापरवाही नहीं बल्कि सुनियोजित तरीके से अंजाम दिया गया फर्जीवाड़ा है, जिसमें जिम्मेदार वनकर्मी और निजी फर्में एक ही धुरी पर नजर आती हैं।विभाग के विश्वस्त सूत्रों के अनुसार मरवाही परिक्षेत्र में पहले से विवादों में रहे दो वन कर्मियों को जानबूझकर अहम जिम्मेदारियां सौंपी गईं। मरवाही परिक्षेत्र सहायक शिवशंकर तिवारी को चार अत्यंत महत्वपूर्ण प्लांटेशन साइटों का प्रभारी बनाया गया, जिसके बाद ग्रीन क्रेडिट योजना की जमीनी सच्चाई उजागर होने लगी। आरोप है कि प्लांटेशन कार्य स्वीकृत स्टीमेट के अनुसार कराया ही नहीं गया। न खाद का समुचित उपयोग हुआ, न कीटनाशक दवाओं का छिड़काव किया गया, लेकिन कागजों में कार्य पूर्ण दर्शाकर फर्मों को भुगतान करा दिया गया।सबसे गंभीर आरोप यह सामने आया है कि जहां टाल प्लांट पौधों का रोपण किया जाना था, वहां टाल प्लांट की जगह मनरेगा योजना के तहत पहले से तैयार पौधों को ही रोपण दिखा दिया गया। इसके बावजूद प्रति पौधा 63 रुपये की दर से पौध तैयारी एवं रोपण का खर्च दर्शाकर राशि बुक की गई। खाद, रेत, गोबर खाद सहित अन्य सामग्रियों के नाम पर फर्जी बिल लगाए गए और इन्हीं बिलों के सहारे फर्मों को भुगतान कर करोड़ों रुपये की राशि का बंदरबांट किया गया।विश्वस्त सूत्र बताते हैं कि स्वीकृत प्लांटेशन रकबे से कम क्षेत्र में ही रोपण कराया गया, लेकिन कागजों में पूरा रकबा दर्शा दिया गया। प्लांटेशन को सिंचित बताया गया, जबकि मौके पर एक भी पंप या सिंचाई व्यवस्था चालू हालत में नहीं मिली। बोर खनन और पाइप खरीदी जैसे कार्य भी केवल फाइलों में दर्ज हैं, जमीनी हकीकत में इनके कोई स्पष्ट प्रमाण नजर नहीं आते, लेकिन भुगतान पूरा कर लिया गया।मामला यहीं तक सीमित नहीं है। खोडरी क्षेत्र स्थित केंद्रीय नर्सरी साधवानी भी गंभीर संदेह के घेरे में है। विभागीय सूत्रों के अनुसार नर्सरी प्रभारी राकेश राठौर के कार्यकाल में पौध तैयार करने से लेकर रोपण तक के कार्यों में भारी अनियमितताएं हुई हैं। कागजों में पौध उत्पादन और वितरण के बड़े आंकड़े दर्शाए गए, जबकि वास्तविक स्थिति इससे बिल्कुल उलट बताई जा रही है। सूत्रों का कहना है कि यदि नर्सरी रजिस्टर, भुगतान अभिलेख और मौके की स्थिति का मिलान किया जाए तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं।ग्रीन क्रेडिट योजना के नाम पर हुए इस कथित जंगल घोटाले को लेकर अब विभागीय हलकों में भी खलबली मची हुई है। विश्वस्त सूत्रों के अनुसार यदि पूरे मामले की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच कराई जाती है तो केवल निचले स्तर के कर्मचारियों ही नहीं, बल्कि जिम्मेदारी सौंपने वाले अधिकारी भी सवालों के घेरे में आएंगे। यह सवाल भी उठ रहा है कि आखिर किनके संरक्षण में यह पूरा खेल चलता रहा और कौन दोषियों को बचाने में जुटा है। फिलहाल मरवाही वनमंडल में यह चर्चा आम है कि ग्रीन क्रेडिट योजना हरियाली के लिए थी या फिर भ्रष्टाचार की हरी चादर ओढ़ाकर करोड़ों की लूट का जरिया बना दी गई। वहीं सर्वव्यापी इस विभाग के और भी भ्रष्टाचार को निरंतर प्रकाशित करते रहेंगे।