तरुण कौशिक/ संपादक, सर्वव्यापी
बिलासपुर संभाग के मरवाही वनमंडल में इन दिनों हालात सामान्य नहीं हैं। वर्षों से जड़ें जमाए बैठे कथित भ्रष्ट वन कर्मियों की गतिविधियाँ जैसे-जैसे उजागर हो रही हैं, वैसे-वैसे विभाग के भीतर उथल-पुथल तेज होती जा रही है। इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में हैं 2020 बैच की आईएफएस अधिकारी एवं मरवाही डीएफओ ग्रीष्मी चांद, जो अवैध गतिविधियों पर लगाम कसने की कोशिश कर रही हैं।सूत्रों के मुताबिक, ग्रीष्मी चांद द्वारा अवैध कटाई, संदिग्ध भुगतान, फर्जी कार्यों और वर्षों से लंबित मामलों की फाइलें खुलवाने के बाद उन कर्मचारियों में खलबली मच गई है, जो लंबे समय से “सेटिंग सिस्टम” के सहारे मलाई काटते आ रहे थे। कार्रवाई की आहट मिलते ही अब इन तत्वों ने सीधी लड़ाई के बजाय साजिश और दुष्प्रचार का रास्ता अपनाया है।बताया जा रहा है कि कुछ भ्रष्ट वन कर्मी छुट्टभैये नेताओं, बिचौलियों और प्रभावशाली दलालों को आगे कर महिला अधिकारी की छवि को नुकसान पहुंचाने में जुटे हैं। चर्चा है कि एक कथित दलाल खुलेआम लाखों रुपये की वसूली का दावा करते हुए खुद को विभागीय फैसलों का “मैनेजर” बता रहा है। यही नहीं, कुछ पत्रकारों को भी भ्रष्टाचार से जुड़ी खबरें दबाने के एवज में मोटी रकम देने की चर्चाएं सामने आ रही हैं।यदि ये आरोप सही साबित होते हैं, तो मामला केवल एक ईमानदार अधिकारी को बदनाम करने तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि यह पूरे प्रशासनिक तंत्र और मीडिया की साख पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। जानकारों का कहना है कि जिन पर आरोप हैं, वही खुद को “सूत्र” बताकर अफवाहों का बाजार गर्म कर रहे हैं, ताकि असली भ्रष्टाचार से ध्यान हटाया जा सके।प्रशासनिक गलियारों में यह चिंता भी गहराने लगी है कि यदि इस पूरे नेटवर्क की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच नहीं कराई गई, तो ईमानदार अधिकारियों का मनोबल टूटना तय है और भ्रष्ट तत्वों के हौसले और बुलंद होंगे। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ा होना अब अपराध बन गया है?क्या ईमानदार महिला अधिकारी को दबाने के लिए दलाल-तंत्र को खुली छूट मिल रही है? और क्या पैसों के दम पर सच को हमेशा के लिए दबाया जा सकता है?यह मामला अब शासन और उच्च वन अधिकारियों के लिए अग्निपरीक्षा बन चुका है। यदि समय रहते निष्पक्ष जांच और सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो यह केवल एक अधिकारी की नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की हार मानी जाएगी।