तरुण कौशिक/ संपादक, सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ के स्कूल शिक्षा विभाग में कानून, संविधान और सर्वोच्च संवैधानिक पदों के आदेशों की खुलेआम अवहेलना का सनसनीखेज मामला सामने आया है। विभागीय मंत्री गजेन्द्र यादव और सचिव सिद्धार्थ कोमल सिंह परदेशी वर्षों से लंबित विभागीय जांचों को पूर्ण कराने में पूरी तरह असफल साबित हो रहे हैं। हालात ऐसे हैं कि हाईकोर्ट के स्पष्ट आदेश और राज्यपाल की अपीलें भी विभागीय फाइलों में रद्दी और कचरे के समान पड़ी हुई हैं।
सूत्रों के अनुसार, खंड शिक्षा अधिकारी, जिला शिक्षा अधिकारी , व्याख्याता, शिक्षक एवं अन्य कर्मचारियों से जुड़े गंभीर मामलों में वर्षों पूर्व जांच के आदेश जारी हुए थे। कई मामलों में तो न्यायालय ने समय-सीमा तय कर विभाग को निर्णय लेने के निर्देश दिए, लेकिन न जांच पूरी हुई, न दोषियों पर कार्रवाई, न पीड़ितों को न्याय।सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिन मामलों में राज्यपाल स्तर से अपील कर त्वरित निराकरण के निर्देश दिए गए, वे भी शिक्षा विभाग की फाइलों में धूल फांक रहे हैं। यह स्थिति सीधे-सीधे शासन की कार्यप्रणाली, मंत्री की जवाबदेही और सचिवीय नियंत्रण पर बड़ा सवाल खड़ा करती है।विभागीय गलियारों में चर्चा है कि कुछ प्रभावशाली अधिकारियों और कर्मचारियों को बचाने के लिए जानबूझकर जांचों को लटकाया जा रहा है, ताकि निलंबन, वेतन कटौती या बर्खास्तगी जैसी कार्रवाई से उन्हें बचाया जा सके। वहीं दूसरी ओर, शिकायतकर्ता और पीड़ित शिक्षक-कर्मचारी वर्षों से न्याय की आस में दर-दर भटकने को मजबूर हैं।शिक्षा विभाग की यह मनमानी न सिर्फ न्यायपालिका के आदेशों का अपमान है, बल्कि संवैधानिक पद राज्यपाल की गरिमा पर भी सीधा प्रहार मानी जा रही है। सवाल यह भी उठ रहा है कि जब हाईकोर्ट और राज्यपाल के आदेशों की कोई अहमियत नहीं, तो फिर आम कर्मचारी किससे न्याय की उम्मीद करे?अब देखना यह होगा कि मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव इस गंभीर प्रशासनिक लापरवाही पर संज्ञान लेते हैं या स्कूल शिक्षा विभाग यूं ही आदेशों को कचरे में डालकर मनमानी करता रहेगा।