फर्जी आदेश के दम पर वर्षों तक सरकारी नौकरी करने वाले चार कर्मचारी बर्खास्त, गंभीर धाराओं में एफआईआर दर्ज।

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तरुण कौशिक/ संपादक, सर्वव्यापी

खैरागढ़ जिले में शिक्षा विभाग को हिलाकर रख देने वाला एक बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया है, जहाँ राज्य शिक्षा आयोग के कथित आदेश के सहारे वर्षों तक सरकारी सेवा करने वाले चार कर्मचारियों को जांच के बाद सेवा से बर्खास्त कर दिया गया है। इसके साथ ही इनके खिलाफ धोखाधड़ी, जालसाजी और आपराधिक षड्यंत्र जैसी गंभीर धाराओं में आपराधिक मामला भी दर्ज कराया गया है। इस कार्रवाई के बाद पूरे शिक्षा विभाग में हड़कंप मच गया है और अन्य नियुक्तियों की भी समीक्षा की सुगबुगाहट तेज हो गई है।विश्वस्त सूत्रों के अनुसार यह मामला वर्ष 2021 से जुड़ा है, जब टीकमचंद साहू, फगेंद्र सिंहा, रजिया अहमद और अजहर अहमद को सहायक ग्रेड-3 एवं डाटा एंट्री ऑपरेटर के पद पर नियुक्ति दी गई थी। इन नियुक्तियों के लिए राज्य शिक्षा आयोग के तत्कालीन सचिव डॉ. ओपी मिश्रा के नाम से जारी एक आदेश को आधार बनाया गया था। प्रारंभिक तौर पर यह नियुक्तियां सामान्य प्रक्रिया के तहत प्रतीत हो रही थीं, लेकिन दस्तावेजों की गहराई से जांच में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए।जांच में यह स्पष्ट हुआ कि जिस आदेश क्रमांक के आधार पर नियुक्तियां की गई थीं, वह आदेश वास्तव में राज्य शिक्षा आयोग से संबंधित ही नहीं था। उक्त क्रमांक का पत्र तो बैंक ऑफ बड़ौदा की विवेकानंद नगर शाखा के लिए जारी किया गया था। इतना ही नहीं, आदेश पर दर्ज सचिव के हस्ताक्षर भी आयोग के आधिकारिक रिकॉर्ड से पूरी तरह अलग पाए गए, जिससे यह साफ हो गया कि पूरा नियुक्ति पत्र ही फर्जी था।सूत्र बताते हैं कि फर्जी आदेश के आधार पर मई 2022 में टीकमचंद साहू को हाईस्कूल मोहगांव, फगेंद्र सिंहा को उच्चतर माध्यमिक शाला बकरकट्टा, रजिया अहमद को उमा शाला पैलीमेटा तथा अजहर अहमद को छुईखदान बीईओ कार्यालय में पदस्थ किया गया था। बाद में जिले के गठन के बाद रजिया अहमद को कलेक्टोरेट की डीएमएफ शाखा और अजहर अहमद को अभियोजन शाखा में अटैच कर दिया गया, जबकि फगेंद्र सिंहा और टीकमचंद साहू से जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय में कार्य लिया जा रहा था। इस तरह चारों ने लंबे समय तक शासकीय व्यवस्था के भीतर रहकर कार्य किया।अगस्त 2025 में जब दस्तावेजों की नियमित समीक्षा के दौरान नियुक्ति पत्रों की सत्यता पर संदेह गहराया, तब चारों कर्मचारियों ने अलग-अलग कारणों का हवाला देते हुए अवकाश ले लिया। विभाग द्वारा मांगे गए स्पष्टीकरण और प्रस्तुत दस्तावेज संतोषजनक नहीं पाए गए। इसके बाद राज्य शिक्षा आयोग से औपचारिक सत्यापन कराया गया, जिसमें यह पूरी तरह स्पष्ट हो गया कि संबंधित आदेश फर्जी है और आयोग द्वारा कभी जारी ही नहीं किया गया था।जांच रिपोर्ट मिलने के बाद जिला शिक्षा अधिकारी लालजी द्विवेदी ने छत्तीसगढ़ सिविल सेवा नियम, 1966 के तहत चारों कर्मचारियों को तत्काल प्रभाव से सेवा से बर्खास्त कर दिया। इसके साथ ही पूरे मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस थाने में लिखित शिकायत दर्ज कराई गई, जिस पर पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 467, 468, 471 एवं 120-बी के तहत अपराध पंजीबद्ध कर लिया है।जिला शिक्षा अधिकारी लालजी द्विवेदी ने बताया कि शासकीय सेवा में फर्जी दस्तावेजों के आधार पर नियुक्ति न केवल नियमों का उल्लंघन है, बल्कि यह एक गंभीर आपराधिक कृत्य भी है। विभाग किसी भी स्तर पर अनियमितता या धोखाधड़ी को बर्दाश्त नहीं करेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि मामले की निष्पक्ष जांच की जा रही है और यदि इसमें किसी अन्य व्यक्ति, कर्मचारी या अधिकारी की संलिप्तता सामने आती है, तो उसके खिलाफ भी सख्त कार्रवाई की जाएगी।फिलहाल पुलिस इस पूरे फर्जीवाड़े की परतें खोलने में जुटी है और यह आशंका जताई जा रही है कि यह मामला केवल चार कर्मचारियों तक सीमित नहीं हो सकता। जांच का दायरा बढ़ने के साथ शिक्षा विभाग की पुरानी नियुक्तियों पर भी संकट के बादल मंडराने लगे हैं।


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