गौरेला–पेंड्रा–मरवाही/ नूर मोहम्मद/ ब्यूरो चीफ सर्वव्यापी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा पर्यावरण संरक्षण को जनआंदोलन का स्वरूप देने के उद्देश्य से शुरू किया गया “एक पेड़ माँ के नाम” अभियान जहां देशभर में वृक्षारोपण और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता का संदेश दे रहा है, वहीं छत्तीसगढ़ के हरे-भरे अंचलों में इसी अभियान की भावना को ठेंगा दिखाने वाले गंभीर आरोप सामने आ रहे हैं। छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय अजीत जोगी के गृह ज़िले गौरेला पेंड्रा मरवाही अंतर्गत मरवाही वन मंडल में पेड़ों की कथित अवैध कटाई का मामला अब प्रशासनिक गलियारों से निकलकर सत्ता के शीर्ष तक पहुँच चुका है।स्थानीय ग्रामीणों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और पर्यावरण प्रेमियों का आरोप है कि मरवाही वन मंडल क्षेत्र में लंबे समय से बहुमूल्य पेड़ों की अवैध कटाई खुलेआम जारी है। जंगलों से लकड़ी का अवैध परिवहन, रात के अंधेरे में कटाई और नियमों की धज्जियाँ उड़ाने की घटनाएँ लगातार सामने आ रही हैं। हैरानी की बात यह है कि इन गतिविधियों को लेकर वन विभाग को समय-समय पर लिखित शिकायतें दी गईं, फोटो, वीडियो और अन्य साक्ष्य भी उपलब्ध कराए गए, लेकिन इसके बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।आरोप सीधे तौर पर मरवाही वन मंडलाधिकारी ग्रीष्मी चांद के संरक्षण पर आकर टिकते हैं। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि बिना विभागीय संरक्षण के इतने बड़े पैमाने पर अवैध कटाई संभव नहीं है। विभागीय उदासीनता और कार्रवाई से बचने की प्रवृत्ति ने पूरे वन तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जंगलों की रखवाली की जिम्मेदारी जिन कंधों पर है, वही कंधे यदि मूकदर्शक बने रहें तो पर्यावरण संरक्षण के सरकारी दावे खोखले प्रतीत होते हैं।यह पूरा मामला केवल प्रशासनिक लापरवाही तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि अब यह राजनीतिक और नैतिक जिम्मेदारी का विषय बन चुका है। बताया जा रहा है कि मरवाही वन मंडल में हो रही अवैध कटाई से जुड़ी विस्तृत शिकायत अब सीधे मुख्यमंत्री विष्णु देव साय तक पहुँचा दी गई है। शिकायत में न केवल कटाई के प्रमाण संलग्न हैं, बल्कि यह भी उल्लेख किया गया है कि किस प्रकार निचले स्तर से लेकर उच्च स्तर तक कार्रवाई को टालने की कोशिश की गई।स्थानीय लोगों में इस मुद्दे को लेकर भारी आक्रोश है। उनका कहना है कि एक ओर सरकार पर्यावरण संरक्षण, जलवायु परिवर्तन और भावी पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य की बात करती है, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर जंगलों की बेरहमी से कटाई हो रही है। मरवाही जैसे वन बहुल क्षेत्र में यदि यही हाल रहा तो आने वाले वर्षों में जैव विविधता, जल स्रोत और स्थानीय आजीविका पर गहरा संकट खड़ा हो जाएगा।पूर्व मुख्यमंत्री स्व. अजीत जोगी का गृह क्षेत्र होने के कारण भी यह मामला विशेष संवेदनशील माना जा रहा है। मरवाही की पहचान उसकी हरियाली, जंगल और आदिवासी संस्कृति से रही है। ऐसे में वन संपदा के दोहन पर प्रशासनिक चुप्पी न केवल पर्यावरण के साथ अन्याय है, बल्कि क्षेत्र की ऐतिहासिक और सामाजिक विरासत पर भी आघात है।अब निगाहें मुख्यमंत्री स्तर से होने वाली कार्रवाई पर टिकी हैं। क्या अवैध कटाई के आरोपों की निष्पक्ष उच्चस्तरीय जांच होगी? क्या जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की जाएगी? या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा—ये सवाल आज मरवाही से लेकर रायपुर तक गूंज रहे हैं। “एक पेड़ माँ के नाम” अभियान की सच्ची सार्थकता तभी सिद्ध होगी, जब ऐसे मामलों में कठोर निर्णय लेकर जंगलों को वास्तव में बचाया जाएगा।