जंगल उजड़े, शहरों में भटके वन्यजीव — संरक्षण के नाम पर अरबों का बजट, ज़मीनी हकीकत शून्य!

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तरुण कौशिक/संपादक, सर्वव्यापी

वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग की कार्यप्रणाली एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। जंगलों के लगातार कटाव, प्राकृतिक जलस्रोतों के खत्म होने और संरक्षण योजनाओं की अनदेखी का सीधा असर अब जंगल के रहवासी जीव-जंतुओं पर पड़ता साफ दिखाई दे रहा है। अपने प्राकृतिक आवास नष्ट होने से मजबूर होकर वन्यप्राणी भोजन और पानी की तलाश में जंगल छोड़कर गांवों, कस्बों और घनी आबादी वाली बस्तियों में प्रवेश कर रहे हैं। यह स्थिति जहां वन्यजीवों के अस्तित्व के लिए खतरा बन चुकी है, वहीं आम नागरिकों की सुरक्षा पर भी गंभीर संकट खड़ा कर रही है।बीते कुछ वर्षों में वन क्षेत्रों में अवैध कटाई, तथाकथित विकास कार्यों और विभागीय लापरवाही के चलते जंगलों का बड़ा हिस्सा उजड़ चुका है। जिन इलाकों में कभी हरियाली, घना वन और प्राकृतिक नाले-तालाब हुआ करते थे, वहां आज सूखी जमीन और उजाड़ परिदृश्य नजर आता है। जंगल के भीतर भोजन और पानी की व्यवस्था खत्म होने से जानवरों के पास बस्तियों की ओर बढ़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है। परिणामस्वरूप मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं, कहीं फसलें नष्ट हो रही हैं, कहीं मवेशियों पर हमला हो रहा है और कई मामलों में वन्यजीव खुद भी हिंसा का शिकार बन रहे हैं।सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि वन्यजीव संरक्षण, उनके लिए भोजन-पानी की व्यवस्था, जंगलों के संरक्षण और पर्यावरण संतुलन बनाए रखने के नाम पर हर वर्ष विभाग को अरबों रुपये का बजट आवंटित किया जाता है। योजनाओं की फाइलें, बैठकों के दस्तावेज और रिपोर्टों में कार्य पूर्ण होने के दावे तो भरपूर हैं, लेकिन जमीनी सच्चाई इससे बिल्कुल उलट है। न जंगल सुरक्षित दिखाई दे रहे हैं, न जलस्रोत संरक्षित हैं और न ही वन्यजीवों के लिए स्थायी समाधान नजर आ रहा है। संरक्षण की पूरी कवायद कागजों तक ही सीमित होकर रह गई है।पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि जंगलों से वन्यजीवों का बाहर निकलना एक गंभीर चेतावनी है, जो यह संकेत देता है कि प्रकृति का संतुलन बुरी तरह बिगड़ चुका है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो हालात और भयावह हो सकते हैं। सवाल यह है कि जब बजट मौजूद है, योजनाएं मौजूद हैं, तो फिर जंगल और उसके जीव असुरक्षित क्यों हैं? आखिर इन हालात की जिम्मेदारी कौन लेगा?जानकारों का कहना है कि अब कागजी संरक्षण नहीं, बल्कि जमीनी कार्रवाई की जरूरत है। अवैध कटाई पर सख्त नियंत्रण, जलस्रोतों का पुनर्जीवन, वन्यजीवों के लिए सुरक्षित गलियारों का निर्माण और निगरानी तंत्र को मजबूत किए बिना स्थिति में सुधार संभव नहीं है। यदि अब भी लापरवाही जारी रही, तो मानव-वन्यजीव संघर्ष और बढ़ेगा, जिसका खामियाजा जंगल, जीव-जंतु और आम जनता—तीनों को भुगतना पड़ेगा।


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