राजस्व भूमि पर हरे साल वृक्षों की सुनियोजित कटाई, राजस्व विभाग की चुप्पी कटघरे में मरवाही वनमंडल… 4 साल के पेड़ कटे, 34 लट्ठे बरामद—पर जिम्मेदारी तय करने में क्यों बच रहा राजस्व तंत्र?

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तरुण कौशिक, संपादक, सर्वव्यापी

मरवाही वनमंडल अंतर्गत पेण्ड्रारोड क्षेत्र के ग्राम पंचायत कटरा के आश्रित ग्राम गौरखोज में राजस्व भूमि पर खड़े हरे साल वृक्षों की अवैध कटाई का मामला अब कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। खसरा नंबर 1086 की इस भूमि पर 18 फरवरी 2026 की रात अज्ञात लोगों ने चार नग साल के पेड़ों को काट डाला। कटाई के तुरंत बाद लकड़ी को ठिकाने लगाने की पूरी तैयारी थी और 19 फरवरी को परिवहन की योजना बनाई जा चुकी थी।सूत्रों के मुताबिक, यह कोई अचानक की गई हरकत नहीं थी। मौके पर मिले 34 साल के लट्ठे इस बात की गवाही देते हैं कि पूरी कार्रवाई सुनियोजित थी और इसके पीछे स्थानीय स्तर पर संरक्षण या मिलीभगत की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।मुखबिर की सूचना के बाद वन विभाग की टीम सक्रिय हुई। परिक्षेत्र सहायक मरवाही, धनपुर, परिसर रक्षक गुल्लीडांड, सचराटाला और सुरक्षा श्रमिकों ने तत्काल मौके पर पहुंचकर लकड़ी का परिवहन रोक दिया। वन अमले की तत्परता से एक बड़ी तस्करी विफल हो गई, लेकिन यहीं से मामला राजस्व और वन विभाग के अधिकार क्षेत्र के बीच उलझ गया।क्योंकि भूमि राजस्व विभाग के अधीन थी, इसलिए अनुविभागीय अधिकारी और हल्का पटवारी को सूचित किया गया। पटवारी मौके पर पहुंचे, लकड़ी को जब्त किया और उसे ग्राम पंचायत कटरा के सरपंच को सुपुर्दनामा में सौंप दिया गया। यही कदम अब जांच के केंद्र में है। सवाल उठ रहा है कि जब इतनी बड़ी अवैध कटाई हुई, तो केवल सुपुर्दनामा देकर राजस्व विभाग ने अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया?19 फरवरी 2026 को मौके पर पंचनामा तैयार किया गया। पांच पंच—राजपाल देवशरण गोंड़, चैन सिंह रघुनाथ, रामायण सिंह उमेद सिंह, रघुवीरा देवसिंह और पिताम्बर सुकलाल—ने दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर कर पुष्टि की कि सभी 34 लट्ठे राजस्व भूमि पर ही पाए गए। पंचनामा साफ बताता है कि कटाई राजस्व क्षेत्र में हुई, फिर भी अब तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि उस भूमि की निगरानी की जिम्मेदारी निभाने वाले अधिकारी घटना से पहले क्या कर रहे थे।उपवनक्षेत्रपाल शिव शंकर तिवारी ने 20 फरवरी 2026 को इस पूरे मामले का प्रतिवेदन वनमंडलाधिकारी को प्रेषित कर दिया है। वन विभाग ने अपनी प्रक्रिया निभा दी, लेकिन असली सवाल राजस्व विभाग पर टिक गया है। क्या बिना स्थानीय जानकारी और संरक्षण के राजस्व भूमि से रातों-रात हरे साल के पेड़ काटे जा सकते हैं? क्या पटवारी और संबंधित राजस्व अमले की जिम्मेदारी केवल पंचनामा और सुपुर्दनामा तक सीमित है?इस पूरे घटनाक्रम ने राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। न तो अब तक अज्ञात आरोपियों की पहचान हुई, न ही यह साफ किया गया कि कटाई के समय क्षेत्रीय निगरानी क्यों नाकाम रही। पर्यावरण संरक्षण की बात करने वाला तंत्र जब अपनी ही भूमि पर हो रही लूट को समय रहते नहीं रोक पाता, तो उसकी जवाबदेही तय करना अनिवार्य हो जाता है।गौरखोज की यह घटना केवल चार पेड़ों की कटाई का मामला नहीं है, बल्कि यह राजस्व विभाग की निष्क्रियता और ढीली निगरानी व्यवस्था का आईना है। अब देखना यह है कि जांच आगे बढ़कर दोषियों तक पहुंचती है या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा। इस पूरे मामले पर डीएफओ ग्रीष्मी चांद ने सर्वव्यापी से चर्चा कर कहा कि जो विभाग को बदनाम कर रहे हैं उसे कानूनी नोटिस भेजा जाएगा।


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