तरुण कौशिक, संपादक, सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ की सियासत इन दिनों तेज़ उबाल पर है। सत्ता में आए अभी ज्यादा समय नहीं बीता, लेकिन विष्णु देव साय के नेतृत्व वाली सरकार को लेकर असंतोष की आवाज़ें लगातार तेज़ होती जा रही हैं। ज़मीनी हकीकत, प्रशासनिक फैसलों और राजनीतिक संकेतों को देखें तो यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या आने वाले समय में साय सरकार की हार लगभग तय मानी जा सकती है?सरकार बनने के शुरुआती महीनों में जनता ने अपेक्षाओं का बड़ा पुलिंदा बांधा था—भ्रष्टाचार पर सख्ती, आदिवासी अंचलों का सर्वांगीण विकास, बेरोज़गारी पर ठोस पहल और कानून-व्यवस्था में सुधार। लेकिन समय बीतने के साथ कई मोर्चों पर सरकार इन उम्मीदों पर खरी उतरती नहीं दिखी। नीतिगत घोषणाएं तो हुईं, पर उनका प्रभाव ज़मीन पर सीमित रहा। खासकर ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में यह धारणा गहराई कि “फैसले ऊपर बन रहे हैं, नीचे असर नहीं दिख रहा।”प्रशासनिक स्तर पर भी असंतोष कम नहीं है। कई जिलों में योजनाओं के क्रियान्वयन में ढिलाई, अफसरशाही का हावी होना और स्थानीय प्रतिनिधियों की अनदेखी जैसे आरोप सामने आए। इससे सरकार और संगठन के बीच समन्वय की कमी उजागर हुई। पार्टी कार्यकर्ताओं में यह चर्चा आम है कि सरकार का संदेश जनता तक प्रभावी ढंग से नहीं पहुंच पा रहा, जिसका सीधा नुकसान राजनीतिक भरोसे को हो रहा है।विपक्ष ने इस स्थिति का भरपूर लाभ उठाया है। महंगाई, बेरोज़गारी, वन-अधिकार, और स्थानीय संसाधनों के दोहन जैसे मुद्दों पर सरकार को घेरते हुए विपक्ष ने आक्रामक रुख अपनाया। सोशल मीडिया से लेकर गांव की चौपाल तक, सरकार विरोधी नैरेटिव को धार देने में वे काफी हद तक सफल भी दिखे हैं। परिणामस्वरूप, सत्ताधारी दल रक्षात्मक मुद्रा में नज़र आने लगा है।आदिवासी समाज—जो राज्य की राजनीति की रीढ़ माना जाता है—में भी मिश्रित प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। साय सरकार से विशेष उम्मीदें थीं, लेकिन कई क्षेत्रों में वन अधिकार, विस्थापन और रोज़गार से जुड़े सवाल जस के तस बने हुए हैं। यदि यह असंतोष संगठित रूप लेता है, तो चुनावी गणित पर इसका गहरा असर पड़ सकता है।हालांकि, यह भी सच है कि राजनीति संभावनाओं का खेल है। सरकार के पास अभी भी समय और संसाधन हैं कि वह अपनी रणनीति बदले, ज़मीनी मुद्दों पर त्वरित निर्णय ले और जनसंवाद को प्राथमिकता दे। यदि निर्णायक सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो मौजूदा माहौल साय सरकार के लिए भारी पड़ सकता है।निष्कर्षतः, वर्तमान राजनीतिक संकेत, जनभावनाएं और प्रशासनिक चुनौतियां यह इशारा जरूर कर रही हैं कि छत्तीसगढ़ में सत्ताधारी सरकार के सामने संकट गहराता जा रहा है। हार “तय” है या नहीं—यह आने वाले महीनों की राजनीति तय करेगी, लेकिन इतना स्पष्ट है कि यदि सरकार ने समय रहते दिशा नहीं बदली, तो जनता का फैसला उसके खिलाफ जा सकता है।