बंधुआ मजदूरी की ओर धकेला जा रहा मस्तूरी का ICDS सिस्टमदिनभर सरकारी काम, रात तक डेटा एंट्री… फिर भी आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की सैलरी पर कैंची।

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तरुण कौशिक, संपादक ,सर्वव्यापी

बिलासपुर जिले के मस्तूरी विकासखंड में एकीकृत महिला एवं बाल विकास विभाग (ICDS) के भीतर चल रही व्यवस्थाएं अब गंभीर सवालों के घेरे में हैं। यहां अल्प मानदेय पर कार्यरत आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं से पूरे दिन विभागीय सर्वे, केंद्र संचालन और अन्य बहुउद्देशीय सरकारी कार्य कराए जा रहे हैं, लेकिन महीने के अंत में उनका मानदेय बिना ठोस कारणों के काट लिया जाता है। हालात इतने बदतर हैं कि यह व्यवस्था अब बंधुआ मजदूरी जैसी प्रतीत होने लगी है।लोहार्सि, जयरामनगर और आसपास के क्षेत्रों में कार्यरत आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं में बड़ी संख्या विधवा और परित्यक्ता महिलाओं की है। इनके लिए मिलने वाला मानदेय ही परिवार चलाने का एकमात्र सहारा है। बावजूद इसके, उपस्थिति और रिपोर्ट के नाम पर 10 से 12 दिनों तक की सैलरी काट लेना आम बात बन चुकी है।कार्यकर्ताओं का आरोप है कि कुछ महिला पर्यवेक्षक (सुपरवाइजर) उच्चाधिकारियों और सीडीपीओ के सामने अपनी कार्यकुशलता दिखाने के लिए जानबूझकर कटौती कर रही हैं। उपस्थिति पंजी में हेरफेर, रिपोर्ट को अधूरा बताना और सवाल करने पर नौकरी से हटाने की धमकी—यही रोज़मर्रा की हकीकत है।एक नहीं, कई विभागों का बोझआंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं से सिर्फ महिला एवं बाल विकास का ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, शिक्षा, निर्वाचन और सर्वे जैसे अन्य विभागों का काम भी लिया जा रहा है।सुबह केंद्र खोलना, दोपहर बच्चों को पोषण आहार देना, फिर क्षेत्रीय सर्वे और शाम को ऑनलाइन डेटा एंट्री—पूरा दिन खपाने के बाद भी सम्मानजनक भुगतान नहीं।इससे पहले ‘एसआईआर’ कार्य के दौरान भी कार्यकर्ताओं के वेतन में इसी तरह कटौती की गई थी। मामला सामने आने पर जिला कलेक्टर के हस्तक्षेप से पूरा मानदेय दिलाया गया, लेकिन सख्ती का असर कुछ ही समय रहा। अब फिर वही पुराना ढर्रा लौट आया है।आंगनबाड़ी कार्यकर्ता एवं सहायिका संघ ने विभागीय अधिकारियों को ज्ञापन सौंपकर समस्या से अवगत कराया। संघ का कहना है कि शिकायतों के बावजूद जमीनी स्तर पर कोई बदलाव नहीं हुआ। अधिकारियों की चुप्पी ने पूरे मामले को और संदेहास्पद बना दिया है।“सुबह से शाम तक क्षेत्र में दौड़ते हैं। पचपेड़ी जैसे दूर इलाकों से रिपोर्ट जमा करने कार्यालय आते हैं। फिर भी कहते हैं काम पूरा नहीं हुआ और 10 दिन की सैलरी काट लेते हैं। घर चलाना मुश्किल हो गया है।”सूत्रों के मुताबिक, यह पूरी प्रक्रिया सीडीपीओ की सरपरस्ती में चल रही है। निचले स्तर पर की जा रही मनमानी पर उच्चाधिकारियों की चुप्पी कई गंभीर सवाल खड़े करती है।आंगनबाड़ी कार्यकर्ता एवं सहायिका संघ ने साफ किया है कि यदि यही रवैया जारी रहा तो मस्तूरी ही नहीं, पूरे जिले में व्यापक आंदोलन किया जाएगा। अब सवाल यह है—क्या मेहनतकश महिलाओं को उनका पूरा हक मिलेगा, या बंधुआ मजदूरी जैसी यह व्यवस्था यूं ही चलती रहेगी?


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