तरुण कौशिक, संपादक ,सर्वव्यापी
कलयुग के शास्त्रों में यदि किसी नए देवता की कल्पना की जाए, तो उसके हाथ में त्रिशूल या शंख नहीं, बल्कि कलम होगी। वह कलम, जिसकी स्याही से काग़ज़ पर लिखा गया शब्द किसी का जीवन संवार भी सकता है और उजाड़ भी सकता है। आज के समय में यही शक्ति राजनेताओं, न्यायपालिका, पुलिस और प्रशासनिक अफसरों के हाथों में केंद्रित होती जा रही है—और शायद इसी कारण समाज इन्हें व्यंग्य में ही सही, “भगवान” कहने लगा है।यह कहना अतिशयोक्ति नहीं कि लोकतंत्र में कलम तलवार से अधिक ताक़तवर है। फ़ैसले, आदेश, एफआईआर, निर्णय, फ़ाइलों पर लगे हस्ताक्षर—सब कुछ काग़ज़ पर लिखे कुछ शब्दों का खेल बन गया है। समस्या तब पैदा होती है, जब यही शब्द सत्य को असत्य और असत्य को सत्य में बदलने लगते हैं।राजनेता जब बहुमत के गणित से नैतिकता को कुचल देते हैं, तब लोकतंत्र केवल संख्या का खेल बनकर रह जाता है। न्यायपालिका जब तकनीकी आधारों पर न्याय को टाल देती है, तो पीड़ित की आँखों में कानून अंधा नहीं, संवेदनहीन दिखता है। पुलिस जब विवेक के बजाय दबाव में काम करती है, तब क़ानून रक्षक नहीं, भय का प्रतीक बन जाती है। और प्रशासन जब सेवा के बजाय सत्ता का औज़ार बन जाए, तो शासन और शोषण के बीच की रेखा मिट जाती है।यही वह बिंदु है, जहाँ “भगवान” की उपमा जन्म लेती है। क्योंकि आम नागरिक के पास न तो फ़ाइल है, न मुहर, न आदेश लिखने का अधिकार। उसके पास सिर्फ़ उम्मीद है—कि कहीं कोई कलम ईमानदारी से चलेगी, कोई हस्ताक्षर सच के पक्ष में होंगे।लेकिन सवाल यह है कि क्या ये कलयुगी भगवान जवाबदेह हैं?धर्मग्रंथों के भगवान से तो मनुष्य सवाल नहीं करता, पर लोकतंत्र में तो हर पद, हर अधिकारी, हर संस्था जनता के प्रति उत्तरदायी होनी चाहिए। जब यह जवाबदेही कमजोर पड़ती है, तब शक्ति पूजा में बदल जाती है और व्यवस्था डर का मंदिर।यह संपादकीय किसी संस्था या व्यक्ति विशेष पर आरोप नहीं, बल्कि एक सामूहिक आत्ममंथन की पुकार है। कलम का सम्मान तभी तक है, जब तक उसकी स्याही में न्याय, सत्य और संवेदना हो। वरना वही कलम इतिहास में उन पंक्तियों को लिखेगी, जिन्हें आने वाली पीढ़ियाँ उदाहरण नहीं, चेतावनी के रूप में पढ़ेंगी।कलयुग में भगवान बनने से बड़ा दायित्व है—इंसान बने रहना।और लोकतंत्र की असली परीक्षा भी यही है।