तरुण कौशिक, संपादक ,सर्वव्यापी
बिलासपुर संभाग अंतर्गत गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले के मरवाही वनमंडल में गोबर खरीदी के नाम पर सरकारी धन के गबन का गंभीर मामला सामने आया है। यह प्रकरण तब उजागर हुआ जब विधानसभा में सवाल उठे और दस्तावेज़ों की पड़ताल हुई। आरोप है कि तत्कालीन डीएफओ रौनक गोयल ने कैम्पा शाखा प्रभारी भूपेन्द्र साहू के साथ मिलकर नियमों को दरकिनार करते हुए फर्जी आहरण अनुमति जारी करवाई।शिकायत के अनुसार, गोबर खरीदी के लिए कूटरचित प्रमाणक और फर्जी हस्ताक्षरों के आधार पर ₹1,47,600 की नगद आहरण अनुमति दी गई, जबकि वित्तीय नियमों के तहत ₹5,000 से अधिक की नगद निकासी ही प्रतिबंधित है। इसके बावजूद समिति पिपरिया एवं चूहा बहरा वन परिक्षेत्र, मरवाही के नाम से नगद आहरण कराया गया।आरोप यह भी है कि पिपरिया वन प्रबंधन समिति में सुरेश राठौर, जो मूलतः वन चौकीदार हैं, उन्हें नियमविरुद्ध सचिव बनाया गया—जबकि फॉरेस्ट सर्विस मैनुअल में वन चौकीदार को कोई वित्तीय अधिकार नहीं है। कैम्पा प्रभारी द्वारा कूट रचित आहरण अनुमति तैयार कर डीएफओ से हस्ताक्षर कराए गए और फिर सचिवों पर दबाव बनाकर नगद राशि निकलवाई गई।शिकायतकर्ता का आरोप है कि आहरण के दौरान वन प्रबंधन समिति के अध्यक्ष के भी फर्जी हस्ताक्षर किए गए। नगद राशि सचिव सुरेश राठौर एवं श्रीकांत परिहार के माध्यम से निकालकर कैंपा प्रभारी होते हुए डीएफओ तक पहुंचाई गई।प्रथम दृष्टया यह स्पष्ट होता है कि न केवल नगद आहरण के वित्तीय नियमों का उल्लंघन हुआ, बल्कि पद व अधिकारों की जानबूझकर गलत व्याख्या कर पूरे लेन-देन को योजनाबद्ध तरीके से अंजाम दिया गया। शिकायत में दोषियों के खिलाफ कूटरचना, शासकीय राशि के गबन और धोखाधड़ी के आरोपों में भारतीय न्याय संहिता की सख्त धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज कर कठोर कार्रवाई की मांग की गई है।