तरुण कौशिक, संपादक ,सर्वव्यापी
प्रदेश में मुख्यमंत्री के हर दौरे के साथ विकास और जनसंवाद की उम्मीदें जरूर जगती हैं, लेकिन इन दौरों से जुड़ी जमीनी हकीकत पंचायत राज व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय बनती जा रही है। मुख्यमंत्री के आगमन सभा स्थलों तक भीड़ पहुंचाने के नाम पर कई ग्राम पंचायतों में जिस तरह सरकारी धन का खुलेआम और योजनाबद्ध दुरुपयोग हो रहा है, उसने लोकतंत्र की नैतिकता और प्रशासनिक पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।सूत्रों और सामने आ रही जानकारियों के अनुसार, अनेक ग्राम पंचायतों से औसतन 8 से 10 बसें सभा स्थल भेजी जा रही हैं। इसके अलावा ट्रैक्टर, पिकअप, निजी वाहन और अन्य साधनों के नाम पर खर्च को कई गुना बढ़ा-चढ़ाकर दर्शाया जा रहा है। वास्तविक खर्च और कागजी बिलों के बीच का अंतर इतना अधिक है कि यह सामान्य प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि सुनियोजित आर्थिक गड़बड़ी का संकेत देता है।सबसे अहम सवाल यह उठता है कि आखिर पंचायतों में यह “भीड़ जुटाने” की होड़ क्यों मची है। क्या लोकतांत्रिक समर्थन दिखाने के लिए अब सरकारी खजाने पर बोझ डालना एक स्वीकार्य परंपरा बनती जा रही है? सरपंचों और पंचायत प्रतिनिधियों द्वारा बनाए जा रहे फर्जी या फुलाए गए बिलों के पीछे केवल व्यक्तिगत लाभ नहीं, बल्कि एक ऐसे तंत्र की आहट सुनाई देती है, जिसमें निगरानी और सत्यापन की जिम्मेदारी निभाने वाले विभागों की चुप्पी भी संदिग्ध नजर आती है।विडंबना यह है कि जिन पंचायतों में सड़क, पेयजल, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए अक्सर धन की कमी का हवाला दिया जाता है, उन्हीं पंचायतों में राजनीतिक आयोजनों के नाम पर लाखों रुपये बिना किसी संकोच के खर्च दिखा दिए जाते हैं। यह राशि जनता की है, योजनाओं की है और गांवों के भविष्य की है, जिसे तात्कालिक राजनीतिक प्रदर्शन पर न्योछावर किया जा रहा है।यह मामला केवल कुछ सरपंचों तक सीमित नहीं माना जा सकता। जिला प्रशासन, जनपद पंचायत और संबंधित विभागों की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। क्या इन खर्चों का भौतिक सत्यापन हुआ? क्या यात्रियों की वास्तविक संख्या और वाहनों की वास्तविक व्यवस्था का ईमानदार आकलन किया गया? यदि नहीं, तो इसे महज चूक नहीं, बल्कि संभावित मिलीभगत के रूप में देखा जाना चाहिए।प्रदेश के मुखिया विष्णु देव साय के लिए भी यह आत्ममंथन का विषय है कि यदि उनके दौरों के नाम पर पंचायत स्तर पर भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिल रहा है, तो इसका नैतिक उत्तरदायित्व आखिर किसका है। मुख्यमंत्री का दौरा प्रशासनिक समीक्षा और जनहित संवाद के लिए होता है, न कि सरकारी धन के दुरुपयोग का माध्यम बनने के लिए।अब समय आ गया है कि इस पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय, स्वतंत्र और पारदर्शी जांच कराई जाए। पिछले सभी मुख्यमंत्री दौरों के दौरान पंचायतों द्वारा दिखाए गए परिवहन और अन्य खर्चों का ऑडिट हो, दोषी सरपंचों और अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई की जाए और भविष्य के लिए सख्त व स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएं।यदि आज “भीड़-प्रबंधन” के नाम पर हो रही इस लूट को नजरअंदाज किया गया, तो कल यही प्रवृत्ति पंचायत राज व्यवस्था को अंदर से खोखला कर देगी। लोकतंत्र की असली ताकत फर्जी बिलों या सरकारी बसों से नहीं, बल्कि जनता के विश्वास से बनती है।