के.एस. ठाकुर,कार्यकारी संपादक ,सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ में आईएएस अधिकारियों की देर रात जारी होने वाली तबादला सूचियां अब केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रहीं, बल्कि वे सत्ता, संबंध और संरक्षकवाद की जीवंत पाठशाला बन चुकी हैं। हर बार की तरह इस बार भी सूची आई, लेकिन दो नामों ने पूरे घटनाक्रम को साधारण से असाधारण और सामान्य से संदिग्ध बना दिया। यह समीक्षा उसी सूची और उससे उपजे सवालों पर केंद्रित है।प्रशासनिक दृष्टि से तबादले आवश्यकता, कार्यक्षमता और संतुलन के लिए होते हैं। लेकिन जब तबादले आधी रात को हों, और उनके पीछे तर्क से ज्यादा चर्चाएं हों, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। क्या यह प्रशासनिक जरूरत है, या फिर सत्ता के भीतर चल रही अदृश्य शतरंज की चाल?इस सूची में दो ऐसे अधिकारी सामने आए, जिनका करियर, पदस्थापना और गति तीनों ही सामान्य प्रशासनिक मानकों से अलग दिखाई देते हैं।तीरथ राज अग्रवाल प्रकरण: आरोप, अवसर और रिश्तों की भूमिकापहला और सबसे चर्चित नाम है तीरथ राज अग्रवाल। इनका नाम लगभग 550 करोड़ रुपये के कथित घोटाले से जुड़ चुका है। यह वह स्तर है, जहां आमतौर पर किसी भी अधिकारी का करियर लंबे समय के लिए ठहर जाता है। कुछ समय के लिए उनका आईएएस अवार्ड भी रुका, जिससे यह संकेत मिला कि आरोपों को हल्के में नहीं लिया गया।लेकिन यहीं से कहानी मोड़ लेती है। प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि सरगुजा क्षेत्र से जुड़े सत्ता-संपर्क सक्रिय हुए और धीरे-धीरे पूरे मामले की धार कुंद पड़ती चली गई। इस संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है उनके ससुर—राज्य सरकार में मंत्री राजेश अग्रवाल।राजेश अग्रवाल को मंत्रिमंडल में पर्यटन, संस्कृति और धर्मस्व जैसा संवेदनशील विभाग मिला। यह विभाग न केवल आस्था और परंपरा से जुड़ा है, बल्कि इसमें बजट, परियोजनाएं और प्रभाव तीनों निहित हैं। ऐसे में उसी विभाग में दामाद का प्रभावी प्रशासनिक रोल में आना हितों के टकराव (Conflict of Interest) का गंभीर सवाल खड़ा करता है।वन मंत्री के ओएसडी से सीधे धर्मस्व विभाग तक की यात्रा यह संकेत देती है कि यह बदलाव केवल प्रशासनिक आवश्यकता नहीं, बल्कि शक्ति-संतुलन का पुनर्विन्यास है। चर्चा यह भी है कि औपचारिक रूप से मंत्री भले ही राजेश अग्रवाल हों, लेकिन व्यावहारिक नियंत्रण तीरथ राज अग्रवाल के पास रहेगा। यदि यह सही है, तो यह प्रशासनिक नैतिकता पर सीधा प्रहार है।दूसरा नाम है सौमिल रंजन चौबे। इनकी चर्चा इसलिए नहीं कि वे कहां पदस्थ हुए, बल्कि इसलिए कि वे वहां तक पहुंचे कैसे। न छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग, न संघ लोक सेवा आयोग—किसी पारंपरिक प्रतिस्पर्धी परीक्षा के बिना 15 वर्षों में जिस गति से उनका प्रशासनिक ग्राफ ऊपर गया है, उसने पूरी व्यवस्था को असहज कर दिया है।यह मामला व्यक्तिगत योग्यता से अधिक प्रक्रिया की पारदर्शिता से जुड़ा है। जब हजारों युवा कठिन परीक्षाओं, वर्षों की तैयारी और सीमित अवसरों से गुजरते हैं, तब ऐसे उदाहरण पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगा देते हैं।इन दोनों मामलों को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। ये मिलकर एक बड़ा संकेत देते हैं,क्या रिश्ते और संपर्क अब योग्यता से अधिक निर्णायक हो गए हैं?क्या घोटालों के आरोप करियर में बाधा नहीं, बल्कि अस्थायी असुविधा भर रह गए हैं?क्या परीक्षा और चयन प्रक्रिया केवल आम अभ्यर्थियों के लिए है, विशेष वर्ग के लिए नहीं?यदि इन सवालों के उत्तर स्पष्ट नहीं दिए गए, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान प्रशासन की साख को होगा।यह समीक्षात्मक विश्लेषण किसी एक अधिकारी या मंत्री पर व्यक्तिगत आरोप नहीं, बल्कि उस प्रणाली पर सवाल है, जो ऐसे हालात को जन्म देती है। लोकतंत्र में प्रशासन जनता के भरोसे से चलता है, और भरोसा पारदर्शिता से बनता है, रिश्तों से नहीं।अब जरूरत है कि सरकार और प्रशासन इस तबादला सूची को लेकर स्पष्ट, तथ्यात्मक और सार्वजनिक जवाब दें। क्योंकि अगर सवाल देर रात उठे हैं, तो जवाब दिनदहाड़े मिलना चाहिए।