शोक की मर्यादा या सोशल मीडिया का दिखावा? श्रद्धांजलि सभाओं में संवेदना का संकट।

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तरुण कौशिक, संपादक ,सर्वव्यापी

इन दिनों समाज के विभिन्न वर्गों में दशगात्र, तेरहवीं और श्रद्धांजलि सभाओं का स्वरूप तेजी से बदलता दिखाई दे रहा है। जिन स्थानों पर कभी मौन, संवेदना और शोक की गंभीरता स्वतः महसूस होती थी, वहीं अब मोबाइल कैमरों की क्लिक, सेल्फी और मुस्कुराते चेहरों की मौजूदगी कई असहज सवाल खड़े कर रही है। मृत आत्मा को अंतिम सम्मान देने पहुंचे लोग, श्रद्धांजलि अर्पित करने के बजाय स्वयं को केंद्र में रखकर फोटो खिंचवाते नजर आते हैं। वह भी शोक की मुद्रा में नहीं, बल्कि चेहरे पर मुस्कान के साथ।

यह दृश्य केवल किसी एक तस्वीर या घटना तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज में घटती संवेदनशीलता का प्रतीक बनता जा रहा है। जिन परिवारों ने अपने प्रिय को खोया है, उनके सामने इस तरह का व्यवहार क्या उनके दुख को और गहरा नहीं करता? क्या श्रद्धांजलि सभा का उद्देश्य मौन के माध्यम से शोक में सहभागी होना है, या फिर यह साबित करना कि “हम भी वहाँ मौजूद थे”?श्रद्धांजलि केवल फूल चढ़ाने या दीप जलाने की औपचारिकता नहीं होती। यह वह क्षण होता है, जब पूरा समाज किसी परिवार के दुख को अपना दुख मानता है। ऐसे समय में हँसते चेहरे, पोज़ देती तस्वीरें और सोशल मीडिया पर साझा की जाने वाली पोस्ट उस पवित्र भाव को खोखला कर देती हैं। यह आचरण न केवल दिवंगत आत्मा के प्रति असम्मान है, बल्कि शोक की मर्यादा का भी उल्लंघन है।सोशल मीडिया के इस दौर में मानवीय संवेदनाएँ भी ‘कंटेंट’ बनती जा रही हैं। हर क्षण को कैमरे में कैद करने की प्रवृत्ति ने हमें यह भुला दिया है कि जीवन में कुछ पल ऐसे भी होते हैं, जिन्हें दिखाने के लिए नहीं, बल्कि महसूस करने के लिए होते हैं।

शोक सभा में खींची गई मुस्कुराती तस्वीरें यह सवाल छोड़ जाती हैं, क्या हम वास्तव में संवेदना निभा रहे हैं, या सिर्फ अपनी उपस्थिति का प्रचार कर रहे हैं?समाज को अब आत्ममंथन करने की आवश्यकता है। श्रद्धांजलि सभा कोई उत्सव नहीं, बल्कि संयम, मौन और करुणा का समय है। यदि आज हम अपने व्यवहार में संवेदनशीलता नहीं रखेंगे, तो आने वाली पीढ़ियाँ शोक और सम्मान के अर्थ को केवल तस्वीरों और पोस्ट तक सीमित कर देंगी।आज जरूरत है यह समझने की कि सच्ची श्रद्धांजलि शब्दों या तस्वीरों से नहीं, बल्कि मौन सम्मान, संवेदनशील आचरण और शोक की मर्यादा निभाने से होती है। मुस्कान का भी अपना समय होता है और शोक का भी इन दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना ही एक सभ्य और संवेदनशील समाज की पहचान है।


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