तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

बिलासपुर जिले में साक्षरता अभियान को बढ़ावा देने के उद्देश्य से जारी एक आधिकारिक ‘नेवता-पाती’ इन दिनों चर्चा का विषय बन गया है। दिलचस्प बात यह है कि पत्र का शीर्षक तो शुद्ध छत्तीसगढ़ी भाषा में “नेवता-पाती” लिखा गया है, लेकिन पूरा संदेश हिन्दी में प्रस्तुत किया गया है। इस पत्र पर कलेक्टर संजय अग्रवाल के हस्ताक्षर भी हैं, जिससे यह मामला और भी गंभीर हो जाता है।स्थानीय भाषा और संस्कृति को बढ़ावा देने की बात अक्सर शासन और प्रशासन द्वारा की जाती है, लेकिन जब खुद सरकारी दस्तावेजों में ही छत्तीसगढ़ी भाषा को आधा-अधूरा स्थान दिया जाए, तो सवाल उठना लाजमी है। आम जनता और भाषा प्रेमियों का कहना है कि अगर “नेवता-पाती” जैसे पारंपरिक शब्द का उपयोग किया गया है, तो पूरा संदेश भी छत्तीसगढ़ी में होना चाहिए था, ताकि भाषा का वास्तविक सम्मान और प्रचार-प्रसार हो सके।विशेषज्ञों का मानना है कि छत्तीसगढ़ी भाषा को बढ़ावा देने के लिए केवल प्रतीकात्मक शब्दों का प्रयोग पर्याप्त नहीं है, बल्कि प्रशासनिक स्तर पर पूरी तरह से भाषा को अपनाने की आवश्यकता है। इससे न सिर्फ आम लोगों में आत्मीयता बढ़ेगी, बल्कि भाषा के संरक्षण और विकास को भी बल मिलेगा।इस पूरे मामले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या छत्तीसगढ़ी भाषा केवल औपचारिकता बनकर रह जाएगी, या फिर इसे वास्तविक रूप में शासन-प्रशासन की कार्यशैली में स्थान मिलेगा।अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाता है और क्या भविष्य में ऐसे दस्तावेज पूरी तरह से छत्तीसगढ़ी भाषा में देखने को मिलेंगे या नहीं।