तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ में वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी रतन लाल डांगी को लेकर इन दिनों जो विवाद सामने आया है, उसने न सिर्फ प्रशासनिक हलकों में हलचल मचा दी है, बल्कि कानून और न्याय की निष्पक्षता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। सोशल मीडिया पर वायरल हुई कथित अश्लील और निजी तस्वीरों के बाद गृह विभाग द्वारा उन्हें निलंबित कर दिया गया है, लेकिन पूरे घटनाक्रम के कई पहलू ऐसे हैं जो एकतरफा कहानी पर सवाल उठाते नजर आते हैं।सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जिस महिला द्वारा गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं, वह इतने लंबे समय—लगभग सात वर्षों—तक चुप क्यों रहीं? यदि मामला वास्तव में शोषण या दबाव का था, तो इतने वर्षों तक कोई शिकायत, कोई कानूनी कार्रवाई या सार्वजनिक विरोध सामने क्यों नहीं आया?दूसरी ओर, सोशल मीडिया पर वायरल हुई तस्वीरों और वीडियो कॉल के स्क्रीनशॉट्स को देखकर यह मामला एकतरफा आरोप से अधिक आपसी सहमति वाले संबंध की ओर संकेत करता प्रतीत होता है। सामान्य समझ यही कहती है कि इस तरह की निजी तस्वीरें या वीडियो कॉल बिना दोनों पक्षों की सहमति के संभव नहीं होते। ऐसे में केवल एक पक्ष को कठघरे में खड़ा करना न्याय के सिद्धांतों पर भी सवाल खड़ा करता है।यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि जिस पद की गरिमा का हवाला देकर कार्रवाई की जा रही है, उसी कसौटी पर तथ्यों की निष्पक्ष जांच भी होनी चाहिए। किसी भी अधिकारी का पद निश्चित रूप से जिम्मेदारी और मर्यादा से जुड़ा होता है, लेकिन बिना पूरी सच्चाई सामने आए केवल सार्वजनिक दबाव या सोशल मीडिया ट्रायल के आधार पर छवि निर्माण करना भी उचित नहीं कहा जा सकता।मामले का एक और पहलू जो चर्चा में है, वह है कानून की कथित दोहरी व्यवस्था। आम लोगों के मामलों में जहां त्वरित एफआईआर और गिरफ्तारी देखने को मिलती है, वहीं हाई-प्रोफाइल मामलों में जांच की गति और दिशा दोनों बदलती नजर आती हैं। यही कारण है कि जनता के बीच यह धारणा बनती जा रही है कि कानून का व्यवहार व्यक्ति की हैसियत देखकर बदल जाता है।इस पूरे घटनाक्रम में सबसे जरूरी है निष्पक्ष, तथ्यों पर आधारित और पारदर्शी जांच। केवल आरोपों या भावनात्मक बहाव में निर्णय लेना न तो न्याय के हित में है और न ही समाज के।अंततः सवाल यही है—क्या यह मामला वास्तव में अपराध का है, या फिर सहमति के रिश्ते के टूटने के बाद उपजा विवाद? जब तक इसका स्पष्ट उत्तर सामने नहीं आता, तब तक किसी एक पक्ष को पूरी तरह दोषी ठहराना न्याय के साथ जल्दबाज़ी ही है।