तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ के वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग में एक गंभीर प्रशासनिक मामला सामने आया है, जहां मुख्य सचिव विकास शील के निर्देशों के बावजूद समय सीमा के भीतर जांच पूरी नहीं की जा सकी। विभाग द्वारा जारी आदेश के अनुसार, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग की विभिन्न योजनाओं—जैसे कैंपा (CAMPA) और ग्रीन इंडिया मिशन—में करोड़ों रुपये की गड़बड़ी और भ्रष्टाचार की शिकायत प्राप्त हुई थी।

यह शिकायत छत्तीसगढ़िया एकता मंच बिलासपुर द्वारा की गई थी, जिसमें उच्च स्तरीय जांच की मांग की गई थी।शिकायत को गंभीरता से लेते हुए विभाग ने संबंधित अधिकारियों को 10 से 15 दिनों के भीतर जांच पूरी कर प्रतिवेदन प्रस्तुत करने के स्पष्ट निर्देश दिए थे, ताकि तथ्यों का परीक्षण कर रिपोर्ट शासन को भेजी जा सके। लेकिन निर्धारित समय सीमा बीतने के बाद भी जब जांच रिपोर्ट प्राप्त नहीं हुई, तो विभाग को मजबूर होकर “स्मरण पत्र (तत्काल)” जारी करना पड़ा। आदेश पत्र से स्पष्ट होता है कि मामले को प्राथमिकता के आधार पर निपटाने की अपेक्षा की गई थी, फिर भी स्थिति में कोई ठोस सुधार नहीं हुआ।चिंताजनक पहलू यह है कि दस दिनों की समय सीमा पार होने के बाद अब करीब तीन महीने से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन बिलासपुर वन वृत्त से अब तक कोई स्पष्ट जांच प्रतिवेदन विभाग को प्राप्त नहीं हुआ है। इससे यह संकेत मिलता है कि विभागीय आदेशों का पालन गंभीरता से नहीं किया जा रहा। इस पूरे मामले में बिलासपुर वन वृत्त के सीसीएफ मनोज कुमार पाण्डेय की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। विभागीय हलकों में चर्चा है कि इतनी गंभीर शिकायत के बावजूद कार्रवाई में देरी प्रशासनिक उदासीनता या जानबूझकर टालमटोल की ओर इशारा करती है।लगातार स्मरण पत्र भेजे जाने के बावजूद प्रगति न होना इस बात को और मजबूत करता है कि या तो आदेशों की अनदेखी की जा रही है या फिर किसी स्तर पर मामले को दबाने का प्रयास किया जा रहा है। जिन योजनाओं में गड़बड़ी की शिकायत की गई है, वे राज्य की महत्वपूर्ण पर्यावरणीय योजनाएं हैं, ऐसे में इन पर उठे सवाल न केवल वित्तीय अनियमितता को दर्शाते हैं, बल्कि शासन की प्राथमिक योजनाओं की पारदर्शिता पर भी प्रभाव डालते हैं।विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस प्रकार के मामलों में समय पर जांच और कार्रवाई नहीं होती, तो इससे प्रशासनिक व्यवस्था की विश्वसनीयता कमजोर होती है और शासन के आदेशों की प्रभावशीलता पर भी प्रश्नचिन्ह लग जाता है। फिलहाल, यह पूरा मामला प्रशासनिक जवाबदेही और अनुशासन की बड़ी परीक्षा बनता नजर आ रहा है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विभाग इस प्रकरण में क्या ठोस कदम उठाता है और क्या जिम्मेदार अधिकारियों पर कोई कार्रवाई होती है या नहीं।