तरुण कौशिक, संपादक

छत्तीसगढ़ के गांव के पहचान सिरिफ हरियर खेत, माटी के खुशबू अउ सरल जिनगी नई ये बल्कि वो बिहान के गूंज रहिस, जऊन हर रोज समाज के आत्मा ला जगावत रहिस। वो गूंज, जऊन सिरिफ कान म नई, बल्कि मन के भीतर तक उतर जावत रहिस। प्रभात फेरी- ये शब्द आज भले ही धीरे-धीरे भूले-बिसरे लगत हे, फेर एक समय रहिस जब ये गांव के धड़कन रहिस, गांव के पहचान रहिस, अउ समाज के आत्मा के स्वर रहिस।बिहान के 5 बजे, जब अंधियारी ह धीरे-धीरे हटत रहिस, अउ सूरज अपन पहली किरण धरती म बिछावत रहिस, तब गांव के गली-गली म एक मधुर आवाज गूंज उठत रहिस। 20-25 झिन मनखे, हाथ म मंजीरा, ढोलक, झांझ, अउ कुछ के हाथ म लालटेन-सब मिलके भजन-कीर्तन गावत, “राम नाम”, “भजन”, “जगराता” के सुर म गांव ला जगा देत रहिन। वो नजारा सिरिफ एक धार्मिक गतिविधि नई रहिस, बल्कि एक सामाजिक जागरण के प्रतीक रहिस।प्रभात फेरी म जात-पात, ऊंच-नीच, अमीर-गरीब के कोई भेदभाव नई रहिस। गांव के हर वर्ग, हर उम्र के लोग एक संग खड़े होवत रहिन। ये फेरी एक अइसन मंच रहिस जऊन समाज के हर तबका ला एक समान बनाके रखत रहिस। कोई अगुआई करत रहिस, कोई ढोलक बजाय, कोई गावत-फेर सबके मकसद एके रहिस-समाज के जागरूक बनाना अउ एकता ला मजबूत करना।ये परंपरा सिरिफ आध्यात्मिक नई, बल्कि व्यवहारिक जीवन म घलो असर डालत रहिस। जे मनखे रोज बिहान उठके प्रभात फेरी म शामिल होवत रहिन, उनकर जीवन म अनुशासन साफ दिखत रहिस। वोमन समय के पाबंद रहिन, मेहनती रहिन, अउ समाजिक रूप ले जिम्मेदार नागरिक बनत रहिन। प्रभात फेरी एक तरह ले जीवन जीये के कला सिखावत रहिस- सकारात्मक सोच, संयम अउ सेवा भावना के साथ।फेर आज के समय म जब हमन अपन गांव के गली म नजर दौड़ाथन, त वो सुर, वो गूंज, वो ऊर्जा कहीं खो गे हे। जऊन गली म पहिले भजन के मधुर आवाज सुनई देत रहिस, उहां अब मोबाइल के अलार्म, सोशल मीडिया के नोटिफिकेशन अउ गाड़ियों के शोर हावी होगे हे। ये बदलाव सिरिफ तकनीक के विकास नई, बल्कि समाज के प्राथमिकता म आय बदलाव के संकेत हे।आज के पीढ़ी रात देर तक जागे म विश्वास रखथे- मोबाइल, इंटरनेट, मनोरंजन के दुनिया म डूबे रहिथे अउ बिहान देर तक सोए रहिथे। परिणाम स्वरूप, बिहान के वो समय जऊन सबसे पवित्र अउ ऊर्जावान होथे, वो अब खाली गुजर जाथे। जहां पहिले लोग अपन दिन के शुरुआत भगवान के नाम ले करत रहिन, आज वो दिन सोशल मीडिया स्क्रॉल ले सुरु होथे।पलायन भी एक बड़ा कारण बन गे हे। गांव के युवा रोजगार अउ पढ़ई के तलाश म शहर के ओर बढ़त हें। वोमन आधुनिकता के पीछे भागत-भागत अपन जड़, अपन संस्कृति ले दूर होवत जावत हें। गांव म बचे बुजुर्ग मन अब कमजोर हो गे हें, अउ वो जिम्मेदारी उठाय के ताकत या साथ अब नई मिलत। नवा पीढ़ी म वो अपनापन, वो उत्साह, वो लगाव अब कम दिखत हे।सामाजिक संरचना म भी बड़ा बदलाव आइस हे। पहिले जहां सामूहिकता हावी रहिस, आज व्यक्तिवाद बढ़ गे हे। “मयं” के जगह “हम” के भावना कम होगे हे। हर कोई अपन-अपन दुनिया म व्यस्त होगे हे। एक-दूसर ले मिलना-जुलना, साथ बैठना, संग काम करना- ये सब धीरे-धीरे कम होत जावत हे।दान-पुण्य के भावना घलो कमजोर पर गे हे। पहिले प्रभात फेरी के बाद लोग खुशी-खुशी चावल, दाल, पैसा या अउ कुछ दान करत रहिन, जऊन बाद म गांव के भंडारा, पूजा-पाठ या सामाजिक काम म लगत रहिस। आज वो निस्वार्थ भावना के जगह “लेन-देन” के सोच आ गे हे- हर चीज म हिसाब-किताब।सबसे चिंता के बात ये हे कि ये परंपरा के खत्म होना सिरिफ एक सांस्कृतिक नुकसान नई, बल्कि समाज के गिरावट के संकेत हे। प्रभात फेरी सिरिफ भजन गाना नई रहिस-ये एकता, अनुशासन, सेवा, सहयोग अउ सकारात्मक जीवनशैली के प्रतीक रहिस। ये गांव के हर व्यक्ति ला एक अदृश्य धागा म बांध के रखत रहिस। अब सवाल ये उठथे—का ये गूंज फेर ले जिंदा हो सकथे?जवाब साफ हे-हां, जरूर हो सकथे।जरूरत हे एक पहल के, एक सोच के बदलाव के। अगर गांव के युवा मन ठान लेवय कि वो अपन संस्कृति ला बचाही, त बदलाव निश्चित हे। पंचायत स्तर म बैठक हो सकथे, प्रभात फेरी के महत्व ला समझाय जा सकथे। स्कूल-कॉलेज म सांस्कृतिक कार्यक्रम के माध्यम ले नई पीढ़ी ला जोड़ जा सकथे।बुजुर्ग मन के अनुभव अउ युवा मन के ऊर्जा मिल जावय, त ये परंपरा फेर ले जीवित हो सकथे। हर रविवार या खास अवसर ले सुरु करके धीरे-धीरे इसे रोज के दिनचर्या म बदला जा सकथे। महिला मंडल, युवक मंडल अउ सामाजिक संगठन मन घलो आगे आ सकथें।सरकार घलो अगर चाहे, त गांव-गांव म सांस्कृतिक गतिविधि के लिए प्रोत्साहन दे सकथे। लोक परंपरा के संरक्षण के नाम पर योजना बन सकथे। मीडिया के भूमिका घलो महत्वपूर्ण हे-अगर ये मुद्दा बार-बार उठाही, त जनजागरूकता जरूर बढ़ही।अंत म, ये समझना जरूरी हे कि परंपरा सिरिफ इतिहास नई होथे-ये वर्तमान के जीवनशैली होथे। अगर हमन आज अपन संस्कृति ला जिंदा नई रखबो, त आने वाली पीढ़ी सिरिफ किताब अउ फोटो म ही इसे देखही।वो बिहान के ठंडी हवा, वो भजन के मधुर सुर, वो संग-साथ चलने के एहसास-ये सब आज भी वापस आ सकथे। बस जरूरत हे-एक कदम उठाय के, एक संकल्प लेवाय के,अउ अपन जड़ ला फेर ले अपनाय के। आवव, फेर ले अपन गांव म बिहान के गूंज ला जिंदा करन-काबर कि जिहां संस्कृति जिंदा रहिथे, उहां समाज घलो मजबूत रहिथे।