तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

डिजिटल इंडिया के इस दौर में जहां सरकारी बैंकिंग सेवाओं को आम जनता तक सरल और सुलभ बनाने के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, वहीं State Bank of India की डिजिटल सेवा एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। एक जागरूक ग्राहक ने बैंक के आधिकारिक चैट सिस्टम पर बार-बार शुद्ध हिंदी में अपनी बात रखने की कोशिश की, लेकिन हर बार उसे एक ही जवाब मिला—“Sorry! We are unable to understand your query.”ग्राहक ने स्पष्ट शब्दों में अपनी समस्या रखते हुए लिखा कि उसे अंग्रेजी भाषा का ज्ञान नहीं है और वह चाहता है कि बैंक उसे भारत की राष्ट्रीय भाषा हिंदी या उसकी मातृभाषा में जवाब दे। उसने यहां तक कहा कि “अंग्रेजी न तो हमारी राष्ट्रीय भाषा है और न ही मातृभाषा,” इसलिए संवाद हिंदी में किया जाए। लेकिन बैंक का ऑटोमैटिक सिस्टम उसकी भावनाओं और भाषा—दोनों को समझने में पूरी तरह असफल साबित हुआ।यह घटना केवल एक व्यक्ति की परेशानी नहीं, बल्कि उस बड़ी खाई को उजागर करती है जो तकनीक और आम जनता के बीच भाषा के स्तर पर मौजूद है। सरकारी बैंक होने के बावजूद यदि State Bank of India का चैटबॉट हिंदी जैसी व्यापक भाषा को समझने में सक्षम नहीं है, तो यह सीधे-सीधे उन करोड़ों ग्राहकों के साथ अन्याय है जो अंग्रेजी में पारंगत नहीं हैं और बैंकिंग सेवाओं के लिए डिजिटल माध्यम पर निर्भर होते जा रहे हैं।इस पूरे घटनाक्रम ने एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या भारत में डिजिटल सेवाएं अब भी अंग्रेजी तक सीमित हैं? क्या “डिजिटल इंडिया” का सपना केवल उन्हीं लोगों के लिए है जो अंग्रेजी जानते हैं? जब देश की बड़ी आबादी हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं में संवाद करती है, तो फिर सरकारी संस्थानों के डिजिटल प्लेटफॉर्म इन भाषाओं को प्राथमिकता क्यों नहीं देते?ग्राहक का सीधा और सरल सवाल है—“जब बैंक भारत में संचालित हो रहा है, तो हिंदी में जवाब देने में दिक्कत क्यों?” यह सवाल केवल एक बैंक से नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम से है। क्या यह महज तकनीकी खामी है, या फिर भाषाई उपेक्षा का मामला? क्या सरकारी संस्थाएं आम जनता की भाषा को नजरअंदाज कर रही हैं?यह मामला साफ संकेत देता है कि डिजिटल बैंकिंग की चमक-दमक के पीछे अभी भी बुनियादी खामियां मौजूद हैं। यदि State Bank of India जैसे बड़े संस्थान इस दिशा में ठोस सुधार नहीं करते, तो डिजिटल सेवाओं का लाभ समाज के एक बड़े वर्ग तक कभी नहीं पहुंच पाएगा। अब देखने वाली बात यह होगी कि बैंक इस मुद्दे पर संज्ञान लेता है या फिर ग्राहकों की आवाज ऐसे ही “unable to understand” के जवाबों में दबकर रह जाएगी।