कुर्मी समाज में विवाह को लेकर दोहरे मापदंड पर गहराया विमर्श, समानता की मांग तेज।

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बिलासपुर,भागवत प्रसाद, ब्यूरो चीफ, सर्वव्यापी

कुर्मी समाज में विवाह संबंधों को लेकर लंबे समय से चल रहे अंतर्विरोध अब खुलकर सामने आने लगे हैं। समाजबंधु, पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता तरुण कौशिक द्वारा जारी एक आत्ममंथन संदेश ने इस मुद्दे को नई बहस का केंद्र बना दिया है। उनके संदेश में समाज के भीतर व्याप्त कथित दोहरे मापदंडों पर तीखा प्रश्न उठाया गया है, जिससे सामाजिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है।तरुण कौशिक ने कहा कि कुर्मी समाज ऐतिहासिक रूप से परिश्रम, नैतिकता और प्रगतिशील सोच के लिए जाना जाता रहा है। शिक्षा, प्रशासन, राजनीति और न्याय व्यवस्था में समाज के लोगों ने उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं, जो सामूहिक गर्व का विषय है।इसके बावजूद, विवाह जैसे संवेदनशील विषय पर समाज के भीतर एकरूपता का अभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। उन्होंने इंगित किया कि जहां एक ओर विभिन्न कुर्मी उपसमाजों के बीच वैवाहिक संबंधों को अब स्वीकार किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर यदि कोई सामान्य या आर्थिक रूप से कमजोर परिवार समाज के बाहर विवाह करता है, तो उसे सामाजिक दबाव, कठोर नियमों और कभी-कभी बहिष्कार जैसी स्थितियों का सामना करना पड़ता है।इसके विपरीत, जब समाज के प्रभावशाली, उच्च शिक्षित या उच्च पदों पर आसीन व्यक्ति—चाहे वे प्रशासनिक, न्यायिक या राजनीतिक क्षेत्र से जुड़े हों—अन्य समुदायों जैसे पंजाबी, मुस्लिम, सिंधी या यादव समाज में विवाह करते हैं, तो समाज की प्रतिक्रिया अपेक्षाकृत उदार नजर आती है।उन्होंने इस स्थिति को सामाजिक असंतुलन बताते हुए सवाल उठाया कि क्या समाज में नियम और मर्यादाएं व्यक्ति की हैसियत के आधार पर तय की जाएंगी? क्या समानता का सिद्धांत केवल कहने तक सीमित रह गया है?तरुण कौशिक ने अपने संदेश में इसे “समाज की आत्मा से जुड़ा प्रश्न” बताते हुए कहा कि यदि समय रहते इस पर गंभीर आत्ममंथन नहीं किया गया, तो यह प्रवृत्ति समाज की एकता और विश्वसनीयता को कमजोर कर सकती है।उन्होंने समाज के सभी वर्गों से आगे आकर स्पष्ट और समान नीति अपनाने की अपील करते हुए कहा कि—विवाह जैसे व्यक्तिगत निर्णयों में संवेदनशीलता और सम्मान का भाव रखा जाए,किसी भी स्थिति में भेदभावपूर्ण व्यवहार से बचा जाए,नियम सभी के लिए समान रूप से लागू हों—चाहे व्यक्ति गरीब हो या प्रभावशाली,समाज का उद्देश्य लोगों को जोड़ना होना चाहिए, न कि तोड़ना।साथ ही उन्होंने नई पीढ़ी के संदर्भ में कहा कि उन्हें भय और सामाजिक दबाव के बजाय सम्मान, विश्वास और स्वतंत्रता का वातावरण मिलना चाहिए, ताकि वे जिम्मेदारीपूर्वक अपने निर्णय ले सकें।अंत में उन्होंने कहा कि किसी भी समाज की वास्तविक शक्ति उसकी समानता, न्यायप्रियता और संवेदनशीलता में निहित होती है। समाज तभी सशक्त और महान बनता है, जब वह कमजोर वर्ग के साथ मजबूती से खड़ा हो और प्रभावशाली वर्ग से भी निष्पक्ष रूप से सवाल करने का साहस रखे।इस संदेश के माध्यम से उन्होंने कुर्मी समाज से आह्वान किया है कि वह एक ऐसे समावेशी और न्यायपूर्ण सामाजिक ढांचे की दिशा में आगे बढ़े, जहां सम्मान, नियम और अवसर सभी के लिए समान हों तथा एकता के साथ न्याय भी सुनिश्चित हो।


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