नूर मोहम्मद, ब्यूरो प्रमुख सर्वव्यापी

वन परिक्षेत्र मरवाही के कार्यालय से जारी एक आदेश ने प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 के तहत मांगी गई जानकारी को “वांछित स्वरूप में नहीं” बताते हुए आवेदन निरस्त कर दिया गया, जिससे अब विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं।प्राप्त जानकारी के अनुसार, बिलासपुर निवासी एक सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा केंद्रीय नर्सरी घिघोना से संबंधित जानकारी मांगी गई थी। आवेदन में स्पष्ट रूप से यह जानना चाहा गया था कि स्वीकृति तिथि से लेकर वर्तमान तक किन-किन मदों में पौधों का उत्पादन किया गया तथा उनकी प्रजातियों की विस्तृत जानकारी प्रमाणित प्रति में उपलब्ध कराई जाए।लेकिन वन परिक्षेत्र अधिकारी मरवाही द्वारा जारी पत्र क्रमांक 453, दिनांक 13/04/2026 में यह कहते हुए आवेदन को खारिज कर दिया गया कि मांगी गई जानकारी “वांछित स्वरूप में नहीं है” और इस कारण उसे उपलब्ध कराना संभव नहीं है। आदेश में यह भी उल्लेख किया गया कि आवेदक का आवेदन निरस्त किया जाता है।इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या महज “स्वरूप” का हवाला देकर सूचना देने से इनकार करना सूचना के अधिकार अधिनियम की भावना के अनुरूप है? अधिनियम का उद्देश्य सरकारी कार्यों में पारदर्शिता लाना और नागरिकों को जानकारी उपलब्ध कराना है, न कि तकनीकी आधारों पर जानकारी से वंचित करना।सूत्रों का कहना है कि यदि जानकारी उपलब्ध थी तो विभाग को आवेदक को उचित मार्गदर्शन देते हुए आवश्यक जानकारी उपलब्ध करानी चाहिए थी या आवेदन को संशोधित करने का अवसर देना चाहिए था। सीधे तौर पर आवेदन निरस्त करना नियमों की मंशा के विपरीत माना जा रहा है।इस आदेश की प्रति वनमंडलाधिकारी मरवाही को भी भेजी गई है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि मामला उच्च स्तर तक पहुंच चुका है। अब देखना यह होगा कि विभाग इस पर क्या स्पष्टीकरण देता है और क्या आवेदक आगे अपील का सहारा लेता है।आरटीआई से जुड़े जानकारों का मानना है कि यदि किसी आवेदन में तकनीकी कमी हो, तो संबंधित अधिकारी का दायित्व बनता है कि वह आवेदक को मार्गदर्शन दे, न कि सीधे आवेदन खारिज कर दे। यह प्रावधान सूचना के अधिकार अधिनियम की मूल भावना के विपरीत है। अब इस पूरे प्रकरण ने वन विभाग मरवाही की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा कर दिया है और पारदर्शिता को लेकर नई बहस छेड़ दी है।