तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ के माटी मं रचे-बसे तिहार मन मं “अक्ती” याने अक्षय तृतीया के अपन अलगच महिमा हवय। ये सिरिफ एक धार्मिक तिहार नई, बल्कि ये हमर जीवन शैली, मेहनत, भरोसा अऊ प्रकृति के संग संतुलन के प्रतीक आय। “अक्षय” के मतलब होथे – जऊन कभू खत्म नई होवय, अऊ “तृतीया” मतलब वैशाख महीना के तीसरा दिन। एही से ये दिन ला ऐसे शुभ मानें जाथे जऊन दिन सुरू करे गे हर काम मं बरकत अऊ बढ़ोत्तरी होथे।छत्तीसगढ़ के ग्रामीण जीवन मं अक्ती के महत्व बहुत गहिरा हवय। ये तिहार किसान मन बर एक नवा शुरुआत के संकेत देथे। खेती-किसानी के काम ला धरती माता के आशीर्वाद ले सुरू करे के परंपरा सदियों ले चलत आवत हवय। अक्ती के दिन किसान मन अपन खेत, हल, बैल अऊ खेती के औजार के पूजा करथें। ये सिरिफ पूजा नई, बल्कि ये प्रकृति अऊ श्रम के सम्मान के प्रतीक आय। किसान मन के मन मं ये भरोसा रहिथे के आज के दिन ले सुरू करे गे मेहनत कभू व्यर्थ नई जाही।अक्ती के दिन गांव-गांव मं जऊन उत्साह अऊ उमंग देखे ला मिलथे, वो अपन आप मं अद्भुत होथे। बिहान लेच लोगन मन नहाय-धोके पूजा-पाठ मं लग जाथें। घर-आंगन के सफाई, गोबर ले लिपाई अऊ रंगोली बनाय जाथे। महिलामन पारंपरिक वेशभूषा मं सजे-धजे दिखथें अऊ घर के सुख-समृद्धि बर भगवान ले प्रार्थना करथें। लइका मन घलो इस तिहार मं बढ़-चढ़ के हिस्सा लेथें, जऊन ले ये परंपरा एक पीढ़ी ले दूसर पीढ़ी तक पहुंचत रहिथे।अक्ती के दिन जंवारा बोये के परंपरा छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक पहचान आय। महिलामन अऊ लइका मन माटी के पात्र मं जंवारा बोथें अऊ नियमित रूप ले पानी देके ओकर देखभाल करथें। ये जंवारा सिरिफ धार्मिक प्रतीक नई, बल्कि ये जीवन, हरियाली अऊ विकास के संकेत आय। ये हमन ला सिखाथे के जऊन बीज हमन बोथन, वो एक दिन फल जरूर देथे – चाहे वो मेहनत के होय या संस्कार के।अक्ती के दिन विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश जइसने शुभ काम बिना कऊन मुहूर्त देखे करे जाथे। एखर मतलब ये हवय के ये दिन खुदे मं इतना पवित्र अऊ शुभ आय के कऊन घड़ी के इंतजार करे के जरूरत नई परय। आज के समय मं घलो लोगन मन ये परंपरा ला निभावत हवंय अऊ अपन जीवन के महत्वपूर्ण फैसला अक्ती के दिन लेथें।सोना-चांदी खरीदी के परंपरा घलो अक्ती के संग जुड़ गे हवय। लोगन मन ये दिन नया आभूषण खरीदी के समृद्धि के प्रतीक मानथें। फेर एखर असली मतलब ये हवय के हमन अपन जीवन मं स्थायित्व अऊ सुरक्षा के भावना ला मजबूत करथन। ये आर्थिक रूप ले प्रगति के संकेत घलो देथे।दान-पुण्य के दृष्टि ले अक्ती के दिन बहुत महत्वपूर्ण माने जाथे। समाज के सक्षम वर्ग के लोगन मन गरीब अऊ जरूरतमंद मन ला अन्न, पानी, कपड़ा अऊ धन के दान करथें। ये परंपरा समाज मं समानता अऊ सहानुभूति के भावना ला बढ़ाथे। छत्तीसगढ़ जइसने सरल अऊ सहयोगी समाज मं ये परंपरा आज घलो जिंदा हवय, जऊन हमर सामाजिक मजबूती के आधार आय।अक्ती के एक अउ खास पहलू ये घलो आय के ये तिहार हमन ला प्रकृति के संग जुड़के रहे के संदेश देथे। जब हमन धरती, पानी अऊ खेती के पूजा करथन, त वो दरअसल हमन अपन जीवन के असली आधार के सम्मान करत हवन। आज जब पर्यावरण संकट बढ़त जावत हवय, त अक्ती जइसने तिहार हमन ला याद दिलाथे के प्रकृति के बिना जीवन संभव नई हे।आधुनिक समय मं, जिहां जीवन मं भाग-दौड़ अऊ तनाव बढ़ गे हवय, उहां अक्ती हमन ला ठहर के सोचें के मौका देथे। ये तिहार हमन ला अपन जड़, अपन संस्कृति अऊ अपन जिम्मेदारी के एहसास कराथे। ये सिरिफ पूजा-पाठ तक सीमित नई, बल्कि ये जीवन के सही दिशा चुनें के प्रेरणा देथे।आज जरूरत ये बात के हवय के हमन अक्ती के असली महत्व ला समझन। सिरिफ दिखावा अऊ परंपरा निभाय तक सीमित नई रहि के, हमन एखर भीतर छुपे संदेश ला अपन जीवन मं उतारन। मेहनत, ईमानदारी, परोपकार अऊ प्रकृति के सम्मान – ये चारों बात अक्ती के मूल भावना आय।अंत मं, अक्ती हमन ला ये सिखाथे के जऊन काम हमन सच्चे मन ले शुरू करथन, वो जरूर सफल होथे। ये तिहार भरोसा, सकारात्मक सोच अऊ निरंतर प्रयास के प्रतीक आय। छत्तीसगढ़ के माटी मं बसाय ये परंपरा आज घलो उतनेच मजबूत हवय, अऊ आने वाला पीढ़ी बर ये एक अमूल्य धरोहर बनके रहिही।अक्षय तृतीया के पावन अवसर मं हमन संकल्प ले सकथन के अपन संस्कृति के रक्षा करबो, समाज मं सहयोग के भावना ला बढ़ाबो अऊ प्रकृति के संग संतुलन बनाके रखबो। एही मं हमन सबके भला अऊ सच्चा समृद्धि के रास्ता छुपे हवय।