तरुण कौशिक/ संपादक सर्वव्यापी

भारत देश में जब से महिला कानून को सख्त बनाया गया है,तब से इस कानून की खुलकर दुरुपयोग किया जा रहा है। आपसी सहमति से बने संबंधों के बाद दुष्कर्म के आरोप और फिर वर्षों बाद अदालतों से बरी होने की बढ़ती घटनाएं अब महज कानूनी विवाद नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था पर गंभीर आरोप बनती जा रही हैं। आरोप लगते ही पुलिस की तत्परता गिरफ्तारी में दिखती है, लेकिन वही सिस्टम सच्चाई तक पहुंचने में सालों लगा देता है। इस दौरान एक व्यक्ति न केवल जेल और सामाजिक अपमान झेलता है, बल्कि उसकी पूरी जिंदगी अनिश्चितता और कलंक के बोझ तले दब जाती है।**महिला सुरक्षा के लिए बनाए गए कड़े कानूनों का संतुलित और जिम्मेदार क्रियान्वयन सुनिश्चित करना जहां सरकार की जिम्मेदारी है, वहीं पुलिस प्रशासन की जल्दबाजी और बिना पर्याप्त जांच के की गई कार्रवाई कई मामलों में सवालों के घेरे में है। दूसरी तरफ, न्यायपालिका के अलग-अलग और कई बार विरोधाभासी फैसले आम लोगों के मन में न्याय की प्रक्रिया को लेकर गहरी शंका पैदा कर रहे हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यही है, क्या यह न्याय है या केवल प्रक्रिया का कठोर प्रहार ? अगर वर्षों बाद कोई निर्दोष साबित होता है, तो उसके खोए हुए सम्मान, समय और जीवन की भरपाई कौन करेगा? सरकार, पुलिस या न्यायपालिका-आखिर इसे लेकरजवाबदेही तय कब होगी ?*देश की न्याय व्यवस्था इस समय एक ऐसे चौराहे पर खड़ी दिखाई दे रही है, जहां कानून की सख्ती, पुलिस की जल्दबाजी और अदालतों के विरोधाभासी फैसले—तीनों मिलकर आम नागरिक के भरोसे को लगातार कमजोर कर रहे हैं। महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाए गए कड़े कानूनों की आवश्यकता से कोई इनकार नहीं कर सकता, लेकिन इन कानूनों के क्रियान्वयन में जिस तरह की असंगति और असंतुलन सामने आ रहा है, उसने पूरे सिस्टम को कठघरे में खड़ा कर दिया है।भारतीय न्याय संहिता लागू होने के बाद छेड़छाड़ और दुष्कर्म से जुड़े मामलों में नए प्रावधानों के साथ सख्ती तो बढ़ी है, लेकिन इसके साथ ही जमीनी स्तर पर कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जिन्होंने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या कानून का इस्तेमाल न्याय के लिए हो रहा है या सिर्फ कार्रवाई दिखाने के लिए?लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े मामलों ने इस बहस को और अधिक तीखा बना दिया है। लंबे समय तक आपसी सहमति से साथ रहने वाले जोड़े, जब अलग होते हैं, तो कई मामलों में दुष्कर्म के आरोप सामने आते हैं। इन आरोपों के सामने आते ही पुलिस की कार्यप्रणाली एक तयशुदा पैटर्न पर चलती दिखाई देती है- शिकायत, एफआईआर, गिरफ्तारी और जेल।यहां सबसे बड़ा सवाल उठता है- क्या पुलिस के लिए “आरोप” ही “सत्य” बन चुका है?क्या प्राथमिक जांच और तथ्यों की पुष्टि अब औपचारिकता भर रह गई है?जमीनी हकीकत यह बताती है कि कई मामलों में बिना पर्याप्त साक्ष्य और प्रारंभिक विवेचना के ही आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया जाता है। सामाजिक दबाव, मीडिया ट्रायल और “तुरंत कार्रवाई” दिखाने की होड़ में पुलिस की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की जल्दबाजी न केवल निर्दोष लोगों के अधिकारों का हनन करती है, बल्कि असली पीड़ितों के मामलों को भी कमजोर कर देती है। जब हर मामले में बिना गहराई के कार्रवाई होती है, तो न्याय का संतुलन बिगड़ जाता है।स्थिति और गंभीर तब हो जाती है जब निचली अदालतों के फैसले उच्च न्यायालयों में जाकर पलट जाते हैं। कई मामलों में जिला अदालतें आरोपों के आधार पर सजा सुना देती हैं, लेकिन उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय उन्हीं मामलों में सहमति, संबंधों की प्रकृति और परिस्थितियों को आधार बनाकर राहत दे देते हैं।यह विरोधाभास सिर्फ कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा नहीं, बल्कि सिस्टम के भीतर गहरे समन्वय संकट का संकेत है।एक ही तरह के मामले में दो अलग-अलग न्याय—यह स्थिति न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता को सीधे चुनौती देती है।सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि कई मामलों में आरोपी व्यक्ति वर्षों तक जेल में रहने के बाद उच्च न्यायालय से बरी होता है। सवाल उठता है-उसके खोए हुए साल, उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा और मानसिक पीड़ा की भरपाई कौन करेगा ? क्या सिस्टम के पास इस अन्याय का कोई जवाब है ?इसी बीच एक और विरोधाभासी तस्वीर सामने आती है। जिन मामलों में महिला द्वारा दुष्कर्म का आरोप लगाया जाता है, उन्हीं मामलों में बाद में कुटुंब न्यायालय में स्वयं को पत्नी बताते हुए भरण-पोषण की मांग की जाती है। यह स्थिति न केवल कानूनी प्रक्रिया को उलझाती है, बल्कि न्यायालयों के बीच समन्वय की कमी को भी उजागर करती है।क्या एक ही संबंध को अलग-अलग अदालतों में अलग-अलग रूप में स्वीकार करना न्यायसंगत है?क्या आपराधिक और पारिवारिक न्यायालयों के बीच कोई ठोस समन्वय नहीं होना चाहिए?इस पूरे घटनाक्रम में सरकार की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। कानून बनाकर जिम्मेदारी पूरी मान लेना पर्याप्त नहीं है। जब तक इन कानूनों के क्रियान्वयन के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश, जवाबदेही और निगरानी तंत्र नहीं होगा, तब तक इस तरह के विरोधाभास सामने आते रहेंगे।पुलिस प्रशासन भी इस विवाद के केंद्र में है। एक ओर उस पर पीड़ित को तुरंत न्याय दिलाने का दबाव है, तो दूसरी ओर निष्पक्ष जांच की जिम्मेदारी। लेकिन वर्तमान व्यवस्था में यह संतुलन बिगड़ता हुआ नजर आ रहा है। जल्दबाजी में की गई कार्रवाई कई बार न्याय की बजाय अन्याय को जन्म दे रही है।समाजशास्त्रियों का मानना है कि बदलते सामाजिक ढांचे विशेषकर लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर कानून और न्यायिक सोच दोनों को स्पष्ट और व्यावहारिक बनाना होगा। सहमति की परिभाषा, संबंधों की प्रकृति और आरोपों के समय को लेकर स्पष्ट गाइडलाइन के बिना यह विवाद और गहराता जाएगा।आज स्थिति यह है कि आरोप लगते ही गिरफ्तारी,निचली अदालत से सजा,उच्च अदालत से राहत- यह पूरा क्रम एक ऐसे न्यायिक चक्र में बदल गया है, जिसमें सच और झूठ के बीच की रेखा धुंधली होती जा रही है।अब देश के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है- क्या न्याय व्यवस्था में एकरूपता और पारदर्शिता लाने के लिए सरकार ठोस कदम उठाएगी ?क्या पुलिस को जवाबदेह बनाते हुए जांच प्रक्रिया को मजबूत किया जाएगा ?क्या अदालतों के बीच समन्वय स्थापित कर विरोधाभासी फैसलों पर रोक लगेगी? या फिर आम नागरिक इसी तरह आरोप, गिरफ्तारी और राहत के इस अंतहीन चक्र में पिसता रहेगा? जब तक इन सवालों के जवाब और सुधार जमीन पर नहीं उतरते, तब तक न्याय व्यवस्था पर उठते सवाल और गहराते जाएंगे और “न्याय” शब्द सिर्फ कागजों में ही सीमित होकर रह जाएगा।