तरुण कौशिक,संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ की पहचान केवल उसके प्राकृतिक संसाधनों, सांस्कृतिक विविधता या राजनीतिक इतिहास से नहीं बनती, बल्कि उन व्यक्तित्वों से बनती है जिन्होंने इस मिट्टी को अपनी कर्मभूमि बनाकर उसे दिशा दी। ऐसे ही दो नाम हैं—अजीत जोगी और सी के त्रिवेदी—जो अपने-अपने क्षेत्र में एक युग की तरह स्थापित हुए। एक ने सत्ता के शिखर पर बैठकर समाज को दिशा दी, तो दूसरे ने कलम की ताकत से उसी सत्ता को आईना दिखाया।अजीत जोगी का जीवन संघर्ष, प्रतिभा और अद्भुत उपलब्धियों का जीवंत उदाहरण है। इंजीनियरिंग की पढ़ाई से शुरुआत कर उन्होंने भारतीय पुलिस सेवा (IPS) में स्थान बनाया, फिर भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) में अपनी पहचान स्थापित की। यह सफर ही अपने आप में असाधारण था, लेकिन उन्होंने यहीं रुकना स्वीकार नहीं किया। राजनीति में कदम रखते ही वे तेजी से राष्ट्रीय स्तर पर उभरे और सांसद, विधायक होते हुए छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री बनने का गौरव प्राप्त किया।यह एक ऐसा क्रम है जिसे आज के समय में दोहराना लगभग असंभव लगता है। प्रशासनिक सेवा से लेकर राजनीति के सर्वोच्च पद तक पहुंचने का यह सफर केवल व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा नहीं, बल्कि असाधारण क्षमता, दूरदृष्टि और परिस्थितियों को अपने पक्ष में मोड़ने की कला का परिणाम था। जोगी ने छत्तीसगढ़ के गठन के बाद जो प्रशासनिक और नीतिगत आधार तैयार किया, वही आज भी प्रदेश की संरचना में दिखाई देता है।विशेष रूप से आदिवासी समाज के बीच उनकी छवि एक “मसीहा” की रही। उन्होंने आदिवासी क्षेत्रों में विकास की बात केवल कागजों तक सीमित नहीं रखी, बल्कि उसे जमीन पर उतारने का प्रयास किया। भले ही उनके कार्यकाल में कई विवाद भी जुड़े, लेकिन यह भी सच है कि उन्होंने कभी भी अपने निर्णयों से पीछे हटने का रास्ता नहीं चुना। वे एक ऐसे नेता थे जो परिस्थितियों से समझौता करने के बजाय उन्हें चुनौती देते थे।दूसरी ओर, सी के त्रिवेदी का जीवन उस पत्रकारिता की मिसाल है, जिसे आज के दौर में ढूंढना मुश्किल होता जा रहा है। “डिसेंट रायपुर” जैसे साप्ताहिक समाचार पत्र के माध्यम से उन्होंने जिस निर्भीकता और निष्पक्षता के साथ अपनी बात रखी, वह उन्हें एक अलग पहचान देता है। उनकी पत्रकारिता किसी एजेंडे से प्रेरित नहीं थी, बल्कि सच को सामने लाने की प्रतिबद्धता से संचालित थी।त्रिवेदी की कलम में एक अलग ही धार थी। वे केवल खबरें नहीं लिखते थे, बल्कि उन खबरों के पीछे छिपे सच को उजागर करते थे। उन्होंने सत्ता, प्रशासन और समाज—तीनों पर बराबर नजर रखी और जहां भी उन्हें विसंगतियां दिखीं, उन्होंने बेबाकी से उसे सामने रखा। यही कारण है कि वे केवल एक पत्रकार नहीं, बल्कि एक संस्था बन गए।उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया। न किसी का भय, न किसी का दबाव और न ही किसी प्रकार का प्रलोभन—इनमें से कोई भी चीज उन्हें उनके रास्ते से डिगा नहीं सकी। उन्होंने अपने जीवन के अंतिम क्षणों तक पत्रकारिता को उसी जुनून के साथ जिया, जिस तरह उन्होंने अपने करियर की शुरुआत की थी।अगर इन दोनों महान हस्तियों को एक साथ देखा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि भले ही उनके कार्यक्षेत्र अलग थे, लेकिन उनकी सोच में एक गहरी समानता थी—अडिगता। अजीत जोगी ने सत्ता में रहते हुए कभी झुकना नहीं सीखा, तो सी के त्रिवेदी ने कलम की ताकत को कभी कमजोर नहीं पड़ने दिया। एक ने व्यवस्था को चलाया, तो दूसरे ने उसी व्यवस्था की समीक्षा की।आज के समय में यह सवाल बार-बार उठता है कि क्या फिर से ऐसे व्यक्तित्व जन्म लेंगे? क्या कोई ऐसा नेता आएगा जो प्रशासनिक सेवा से लेकर राजनीति के सर्वोच्च शिखर तक पहुंचे और जनता के बीच अपनी अलग पहचान बनाए? क्या कोई ऐसा पत्रकार होगा जो बिना किसी भय या दबाव के सच को उसी तीखेपन के साथ सामने रखे?वर्तमान परिदृश्य को देखते हुए यह सवाल और भी प्रासंगिक हो जाता है। राजनीति में जहां अवसरवादिता का प्रभाव बढ़ता जा रहा है, वहीं पत्रकारिता भी बाजार के दबावों में अपनी दिशा खोती नजर आ रही है। ऐसे में अजीत जोगी और सी के त्रिवेदी जैसे व्यक्तित्वों की कमी साफ तौर पर महसूस होती है।अजीत जोगी का अंतिम समय भी छत्तीसगढ़ और यहां की जनता के लिए समर्पित रहा। उन्होंने जीवन के आखिरी क्षण तक प्रदेश के विकास और जनता के हितों की बात की। यह उनकी प्रतिबद्धता का प्रमाण है कि उन्होंने अपने व्यक्तिगत संघर्षों और स्वास्थ्य समस्याओं के बावजूद अपने कर्तव्यों को नहीं छोड़ा।वहीं, सी के त्रिवेदी ने भी अंतिम सांस तक अपनी कलम को जिंदा रखा। उन्होंने यह साबित किया कि सच्ची पत्रकारिता कभी मरती नहीं, वह हर दौर में अपने लिए रास्ता बना लेती है। उनकी लेखनी आज भी उन लोगों के लिए प्रेरणा है जो पत्रकारिता को केवल पेशा नहीं, बल्कि समाज सेवा का माध्यम मानते हैं।इन दोनों महान हस्तियों की विरासत केवल उनके कार्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह एक विचारधारा के रूप में जीवित है। अजीत जोगी हमें यह सिखाते हैं कि नेतृत्व केवल पद प्राप्त करने का नाम नहीं, बल्कि जिम्मेदारी निभाने का नाम है। वहीं, सी के त्रिवेदी यह बताते हैं कि पत्रकारिता केवल खबर देने का काम नहीं, बल्कि समाज को जागरूक करने की जिम्मेदारी भी है।छत्तीसगढ़ के इतिहास में इन दोनों नामों का स्थान हमेशा विशेष रहेगा। उन्होंने अपने-अपने क्षेत्र में जो मानदंड स्थापित किए, वे आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मार्गदर्शक के रूप में काम करेंगे। जरूरत इस बात की है कि हम उनके जीवन से सीखें और उन मूल्यों को अपनाने का प्रयास करें, जिन्हें उन्होंने अपने कर्मों से स्थापित किया।अंततः, यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि अजीत जोगी और सी के त्रिवेदी जैसे व्यक्तित्व किसी युग में एक बार ही जन्म लेते हैं। वे केवल अपने समय को नहीं बदलते, बल्कि आने वाले समय के लिए एक दिशा निर्धारित करते हैं। उनके जाने के बाद जो खालीपन पैदा होता है, वह केवल समय के साथ महसूस होता है।यह श्रद्धांजलि केवल शब्दों की औपचारिकता नहीं, बल्कि उन आदर्शों का सम्मान है, जिन्हें इन दोनों महान हस्तियों ने अपने जीवन से जीवंत किया। छत्तीसगढ़ की धरती हमेशा उनके योगदान को याद रखेगी और आने वाली पीढ़ियां उनसे प्रेरणा लेती रहेंगी, यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।