गौठान से गौधाम तक: योजनाएं बदलीं, लेकिन सड़कों पर ‘गौ संकट’ जस का तस।

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तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ में गौ संरक्षण को लेकर सरकारें बदलती रहीं, योजनाएं बदलती रहीं, लेकिन जमीनी हकीकत आज भी सवालों के घेरे में है। पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार ने गौ माताओं के संरक्षण और उनके समुचित पालन-पोषण के लिए बड़े पैमाने पर गौठान निर्माण कराया था, जहां उनके चारा, पानी और देखभाल की व्यवस्था सुनिश्चित करने का दावा किया गया।सत्ता परिवर्तन के बाद भाजपा की विष्णु देव साय सरकार ने इस मॉडल में बदलाव करते हुए गौधाम निर्माण की दिशा में काम शुरू किया। सरकार का तर्क है कि गौधाम अधिक व्यवस्थित और दीर्घकालिक समाधान देंगे।लेकिन इन तमाम दावों और योजनाओं के बीच हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। बिलासपुर जिले के राष्ट्रीय राजमार्गों, राज्य मार्गों और शहर के मुख्य सड़कों पर दिन-रात मवेशियों का जमावड़ा आम बात हो गई है। खासकर रात के समय यह समस्या और भी गंभीर रूप ले लेती है, जब सड़क पर बैठे मवेशी दुर्घटनाओं का कारण बनते हैं।हाल ही में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने भी इस मुद्दे पर कड़ी नाराजगी जताते हुए प्रशासन को फटकार लगाई थी। इसके बावजूद स्थिति में अपेक्षित सुधार नजर नहीं आ रहा है। आए दिन हो रही सड़क दुर्घटनाएं न केवल आम नागरिकों के लिए खतरा बन रही हैं, बल्कि गौ माताओं की सुरक्षा पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर रही हैं।स्थानीय लोगों का कहना है कि न तो गौठानों का प्रभावी संचालन हो रहा है और न ही गौधाम की व्यवस्था अभी धरातल पर दिख रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर गौ संरक्षण का जिम्मा लेने वाले विभाग, संस्थाएं और स्वयंसेवी संगठन कहां हैं?गौ सेवा और संरक्षण के नाम पर राजनीति तो खूब हो रही है, लेकिन सड़क पर भटकती गौ माताएं इस बात की गवाही दे रही हैं कि योजनाओं और वास्तविक क्रियान्वयन के बीच गहरी खाई है।अब जरूरत है केवल नई योजनाएं बनाने की नहीं, बल्कि जमीन पर प्रभावी और जवाबदेह कार्यवाही सुनिश्चित करने की,ताकि गौ माताएं सड़कों पर भटकने के बजाय सुरक्षित और संरक्षित वातावरण में रह सकें, और आम जनता भी सुरक्षित यात्रा कर सके।


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