राजनीतिक नियुक्तियों में देरी से बढ़ा असंतोष: क्या सलाहकारों की चुप्पी सरकार पर भारी?

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तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ में विष्णु देव साय के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी सरकार अपने कार्यकाल के तीन वर्ष पूरे करने की ओर अग्रसर है, लेकिन राजनीतिक नियुक्तियों को लेकर बनी सुस्ती अब सरकार के लिए असहज स्थिति पैदा करती दिख रही है। जमीनी स्तर पर सक्रिय कार्यकर्ताओं के बीच नाराजगी का स्वर तेज होता जा रहा है, जो संगठन और सरकार दोनों के लिए चेतावनी के संकेत हैं।राज्य में अब तक विधानसभा उपाध्यक्ष, विभिन्न निगम-मंडलों, आयोगों, मंडी बोर्ड, नगरीय निकायों में एल्डरमैन और जिला सहकारी केंद्रीय बैंकों के संचालक मंडलों की नियुक्तियां लंबित हैं। ये वही पद हैं जिनके माध्यम से कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी और पहचान मिलती है, लेकिन लगातार हो रही देरी ने पार्टी के भीतर असंतोष को जन्म दे दिया है।पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह के कार्यकाल से तुलना करें तो स्थिति बिल्कुल विपरीत नजर आती है। उनके शासनकाल में राजनीतिक नियुक्तियां समय पर होती रहीं, जिससे संगठन और सरकार के बीच संतुलन बना रहा और भाजपा ने लगातार 15 वर्षों तक सत्ता में मजबूत पकड़ बनाए रखी। वर्तमान स्थिति में वही संतुलन कमजोर पड़ता दिख रहा है।इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा सवाल मुख्यमंत्री के राजनीतिक सलाहकारों की भूमिका पर उठ रहे हैं। जब विष्णु देव साय ने अपने सलाहकारों की नियुक्ति कर रखी है, तो यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वे सरकार को समय पर सही दिशा में मार्गदर्शन दें। लेकिन राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि क्या ये सलाहकार स्थिति की गंभीरता को समझने में चूक रहे हैं, या फिर उनकी प्राथमिकताओं में यह मुद्दा शामिल ही नहीं है?संगठन स्तर पर भी सवाल उठ रहे हैं। किरण सिंह देव और पवन साय से अपेक्षा थी कि वे कार्यकर्ताओं की भावना को समझते हुए सरकार के साथ समन्वय बनाकर इन नियुक्तियों को शीघ्र पूरा कराएंगे। लेकिन मौजूदा हालात यह संकेत दे रहे हैं कि या तो संवाद में कमी है या इस मुद्दे को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा।प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका सीमित है, क्योंकि वे केवल प्रशासनिक निर्णयों तक ही सीमित रहते हैं। ऐसे में यह स्पष्ट है कि राजनीतिक नियुक्तियों में हो रही देरी का समाधान केवल राजनीतिक नेतृत्व के स्तर पर ही संभव है।अब बड़ा सवाल यही है कि क्या विष्णु देव साय और भाजपा नेतृत्व समय रहते इस बढ़ते असंतोष को समझकर ठोस कदम उठाएंगे, या फिर यह मुद्दा आगे चलकर संगठन के भीतर गहरी दरार का कारण बनेगा। राजनीति में कार्यकर्ताओं की नाराजगी अक्सर बड़ी चुनौती बन जाती है और उसे नजरअंदाज करना किसी भी सरकार के लिए जोखिम भरा साबित हो सकता है।


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