तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ में सरकार द्वारा आम जनता की समस्याओं के त्वरित निराकरण और प्रशासन को जवाबदेह बनाने के उद्देश्य से चलाया गया “सुशासन तिहार” अब सवालों के घेरे में आता दिखाई दे रहा है। एक ओर सरकार गांव-गांव जाकर जनता से आवेदन लेने और समस्याओं के समाधान का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर मुख्यमंत्री सचिवालय से जारी आदेशों का ही कई विभागों में पालन नहीं होने की चर्चाएं तेज हो गई हैं। यही कारण है कि बीते वर्ष सुशासन तिहार के दौरान प्राप्त हजारों आवेदन आज भी फाइलों में दबे पड़े हैं और उनका निराकरण अधूरा है।प्रदेश के अलग-अलग जिलों से लगातार ऐसी शिकायतें सामने आ रही हैं कि लोगों ने सड़क, बिजली, पानी, राजस्व, शिक्षा, पंचायत, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा पेंशन जैसी मूलभूत समस्याओं को लेकर आवेदन दिए थे, लेकिन महीनों बीत जाने के बाद भी स्थिति जस की तस बनी हुई है। कई आवेदकों का आरोप है कि आवेदन लेने के बाद विभागों ने केवल खानापूर्ति की और बाद में कोई सुनवाई नहीं हुई।सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि यदि मुख्यमंत्री सचिवालय से जारी निर्देशों का भी पालन विभागीय सचिव और अधिकारी गंभीरता से नहीं कर रहे हैं, तो फिर सुशासन तिहार जैसे बड़े अभियान का वास्तविक उद्देश्य आखिर क्या रह जाता है? प्रशासनिक व्यवस्था में नीचे से लेकर ऊपर तक जवाबदेही तय नहीं होने के कारण जनता में निराशा का माहौल बनता जा रहा है।सोशल मीडिया में इन दिनों सुशासन तिहार को लेकर अनेक पोस्ट, वीडियो और टिप्पणियां वायरल हो रही हैं। कई लोग अपने लंबित आवेदन पत्रों की प्रतियां साझा करते हुए पूछ रहे हैं कि जब पिछले साल के आवेदन ही नहीं निपटे तो नए आवेदन लेने का औचित्य क्या है। कुछ जगहों पर यह भी आरोप लगाए जा रहे हैं कि आवेदन ऑनलाइन पोर्टल में दर्ज तो किए गए, लेकिन विभागीय स्तर पर उन पर आगे कोई कार्रवाई नहीं हुई।ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और अधिक गंभीर बताई जा रही है। पंचायत स्तर पर पेयजल संकट, खराब सड़कें, बिजली कटौती, राशन कार्ड, नामांतरण, सीमांकन और आवास योजना से जुड़ी समस्याओं को लेकर लोग लगातार कार्यालयों के चक्कर काट रहे हैं। इसके बावजूद निराकरण की गति बेहद धीमी बनी हुई है। कई मामलों में अधिकारियों द्वारा यह कहकर पल्ला झाड़ लिया जाता है कि “प्रकरण प्रक्रिया में है”।राजनीतिक और प्रशासनिक विश्लेषकों का मानना है कि सुशासन तिहार की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि शिकायतों के समाधान की निगरानी मजबूत नहीं दिखाई दे रही। यदि किसी आवेदन का समयसीमा में निराकरण नहीं होता, तो संबंधित अधिकारी की जवाबदेही तय होनी चाहिए, लेकिन व्यवहारिक स्तर पर ऐसा कम ही देखने को मिलता है।प्रदेश में यह चर्चा भी तेज है कि कई विभागों के सचिव स्तर तक मुख्यमंत्री सचिवालय से जारी निर्देशों को गंभीरता से नहीं लेते। यही वजह है कि जिलों में बैठे अधिकारी भी आदेशों को प्राथमिकता नहीं देते। प्रशासनिक ढांचे में यही शिथिलता आगे जाकर जनता के बीच असंतोष का कारण बनती है।विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी जनहित अभियान की सफलता केवल आवेदन लेने से नहीं बल्कि उसके अंतिम समाधान से तय होती है। यदि सरकार लाखों आवेदन प्राप्त करने का रिकॉर्ड बनाती है लेकिन उनमें से बड़ी संख्या वर्षों तक लंबित रहती है, तो इससे जनता का विश्वास कमजोर होता है।बीते वर्ष के सुशासन तिहार के दौरान कई जिलों में बड़ी संख्या में आवेदन प्राप्त हुए थे। उस समय दावा किया गया था कि प्रत्येक आवेदन का समयबद्ध निराकरण होगा और शिकायतकर्ता को सीधे जानकारी दी जाएगी। लेकिन जमीनी स्तर पर अनेक लोग आज भी अपने आवेदन की स्थिति जानने भटक रहे हैं।सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे पोस्टों में यह भी लिखा जा रहा है कि “सुशासन केवल मंच और प्रचार तक सीमित नहीं होना चाहिए।” लोगों का कहना है कि यदि किसी गरीब व्यक्ति की जमीन समस्या, बिजली कनेक्शन, पेंशन या आवास का मामला महीनों तक लंबित रहता है, तो उसके लिए सुशासन तिहार का कोई अर्थ नहीं रह जाता।कुछ प्रशासनिक अधिकारियों का तर्क है कि आवेदन संख्या अत्यधिक होने, कर्मचारियों की कमी और तकनीकी प्रक्रियाओं के कारण देरी होती है। लेकिन जनता का सवाल यह है कि जब सरकार बड़े स्तर पर अभियान चला रही है तो उसके लिए आवश्यक प्रशासनिक तैयारी पहले क्यों नहीं की जाती।राजस्व विभाग से जुड़े मामलों में सबसे अधिक शिकायतें सामने आ रही हैं। सीमांकन, नामांतरण, बंटवारा और नक्शा सुधार जैसे प्रकरण महीनों तक लंबित पड़े हैं। वहीं पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग में सड़क, नाली, पेयजल और आवास से संबंधित आवेदन बड़ी संख्या में लंबित बताए जा रहे हैं।शिक्षा और स्वास्थ्य विभाग भी सवालों से अछूते नहीं हैं। कहीं स्कूलों में शिक्षकों की कमी का मामला लंबित है तो कहीं अस्पतालों में डॉक्टर और दवाइयों की कमी की शिकायतें अब तक दूर नहीं हो पाई हैं। जनता का कहना है कि यदि बार-बार आवेदन देने के बाद भी समाधान नहीं मिलता तो लोगों का भरोसा सरकारी तंत्र से उठने लगता है।सुशासन तिहार का मूल उद्देश्य सरकार और जनता के बीच दूरी कम करना बताया गया था। लेकिन यदि जनता को आवेदन देने के बाद भी महीनों तक केवल आश्वासन ही मिले, तो यह अभियान राजनीतिक प्रचार और वास्तविक प्रशासनिक सुधार के बीच उलझा हुआ नजर आने लगता है।विश्लेषकों का मानना है कि सरकार को अब केवल आवेदन संख्या बताने के बजाय यह सार्वजनिक करना चाहिए कि कितने मामलों का वास्तविक समाधान हुआ, कितने लंबित हैं और किन अधिकारियों की वजह से देरी हुई। यदि पारदर्शिता नहीं बढ़ेगी तो सोशल मीडिया में उठ रहे सवाल और तेज हो सकते हैं।प्रदेश में अब यह मांग भी उठने लगी है कि सुशासन तिहार के लंबित प्रकरणों की विभागवार समीक्षा सार्वजनिक रूप से होनी चाहिए। साथ ही मुख्यमंत्री सचिवालय द्वारा जारी आदेशों का पालन नहीं करने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए।जनता के बीच यह धारणा बन रही है कि शासन की मंशा भले सकारात्मक हो, लेकिन विभागीय स्तर पर लापरवाही और उदासीनता के कारण योजनाओं और अभियानों का असर कमजोर पड़ जाता है। यही कारण है कि अब सुशासन तिहार की सफलता से अधिक उसकी विफलताओं पर चर्चा होने लगी है।यदि आने वाले समय में लंबित मामलों का तेजी से निराकरण नहीं हुआ, तो यह मुद्दा राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर बड़ा विवाद बन सकता है। क्योंकि जनता अब केवल घोषणाएं नहीं बल्कि धरातल पर परिणाम देखना चाहती है।सुशासन का वास्तविक अर्थ तभी साबित होगा जब मुख्यमंत्री सचिवालय से लेकर गांव के अंतिम कार्यालय तक आदेशों का पालन समान गंभीरता से हो, जनता को समय पर न्याय मिले और आवेदन केवल आंकड़ों का हिस्सा बनकर न रह जाएं।