संपादक की कलम से…कैमरे के सामने सादगी, कैमरे के पीछे काफिला — आखिर यह दिखावा किसके लिए?

Share Now

तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

देश में इन दिनों एक नई राजनीतिक और प्रशासनिक परंपरा तेजी से दिखाई दे रही है। कोई नेता साइकिल चला रहा है, कोई मंत्री बस में सफर कर रहा है, कोई मुख्यमंत्री सड़क पर पैदल चलते नजर आ रहे हैं, तो कोई कलेक्टर और एसपी आम जनता के बीच सार्वजनिक परिवहन में यात्रा करते दिखाई दे रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील के बाद सादगी, पर्यावरण संरक्षण और ईंधन बचाव के नाम पर यह अभियान देशभर में फैलता दिख रहा है।लेकिन सबसे बड़ा और गंभीर प्रश्न यह है कि जब यह तथाकथित “सादगी यात्रा” हो रही होती है, तब इन यात्राओं के हर एंगल से वीडियो और तस्वीरें कौन बना रहा होता है? कौन कैमरे लेकर पहले से तैयार खड़ा रहता है? कौन सोशल मीडिया पर इन्हें वायरल करने की रणनीति बनाता है? और यदि यह सब स्वतःस्फूर्त है, तो फिर इतनी व्यवस्थित प्रचार व्यवस्था आखिर क्यों दिखाई देती है?यही वह सवाल है जो आम नागरिक के मन में उठ रहा है। जनता समझना चाहती है कि यह वास्तविक ईंधन बचाव है या फिर राजनीतिक ब्रांडिंग का नया मॉडल। क्योंकि यदि कोई व्यक्ति सचमुच सादगी से यात्रा कर रहा है, तो उसका उद्देश्य प्रचार नहीं, व्यवहार परिवर्तन होना चाहिए। लेकिन आज स्थिति यह बन गई है कि यात्रा कम और उसका “प्रमोशनल शूट” ज्यादा दिखाई देता है।किसी मंत्री की साइकिल यात्रा का वीडियो ड्रोन कैमरे से बनता है, किसी अधिकारी के बस में बैठने की तस्वीर कई कैमरों से कैद होती है, किसी नेता के पैदल चलने के पीछे पूरी मीडिया टीम दिखाई देती है। सवाल यह है कि क्या आम आदमी जब बस में यात्रा करता है तो उसके पीछे भी कैमरों की फौज चलती है? क्या किसान खेत जाते समय अपना वीडियो शूट करवाता है? क्या मजदूर रोज की कठिन यात्रा को सोशल मीडिया पर डालता है? नहीं। क्योंकि वह दिखावा नहीं, जीवन जी रहा होता है।आज राजनीति और प्रशासन में “दिखावटी सादगी” का एक नया दौर शुरू हो गया है। जनता की समस्याएं जस की तस हैं, लेकिन कैमरे पर संवेदनशील दिखने की प्रतिस्पर्धा तेज हो गई है। सड़कें टूटी हैं, बिजली संकट जारी है, सरकारी कार्यालयों में फाइलें महीनों अटकी रहती हैं, लेकिन सोशल मीडिया पर नेता और अधिकारी “जनसेवक” की छवि चमकाने में व्यस्त दिखाई देते हैं।विडंबना देखिए कि जो व्यक्ति वास्तव में बिना प्रचार के समाज के बीच काम करता है, उसकी चर्चा नहीं होती। कोई पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता या आम नागरिक रोज सैकड़ों किलोमीटर बाइक से घूमकर जनता की समस्याएं उठाता है, लेकिन उसके पीछे कोई कैमरा नहीं चलता। क्योंकि आज का दौर काम से ज्यादा “कंटेंट” का हो गया है। जो जितना अच्छा वीडियो बनवा ले, वही उतना बड़ा जनसेवक घोषित कर दिया जाता है।सबसे चिंताजनक बात यह है कि अब प्रशासनिक पदों पर बैठे अधिकारी भी इस प्रचार संस्कृति का हिस्सा बनते जा रहे हैं। कलेक्टर, एसपी, यहां तक कि न्याय व्यवस्था से जुड़े लोग भी कैमरे के सामने प्रतीकात्मक गतिविधियां करते दिखाई देते हैं। इससे यह संदेश जाता है कि अब शासन का फोकस काम से ज्यादा “इमेज मैनेजमेंट” पर केंद्रित हो गया है।सवाल यह भी है कि यदि यह यात्रा जनता से जुड़ने के लिए है, तो फिर उसमें सुरक्षा का भारी घेरा क्यों होता है? आम बस में यात्रा करने वाले नेता के आसपास दर्जनों सुरक्षाकर्मी क्यों चलते हैं? साइकिल यात्रा के दौरान पीछे पूरी गाड़ियों की लाइन क्यों होती है? क्या यह वास्तविक सादगी है या फिर व्यवस्थित राजनीतिक मंचन?देश की जनता अब बहुत जागरूक हो चुकी है। वह कैमरे की चमक और वास्तविकता के अंतर को समझने लगी है। जनता जानती है कि सादगी का अर्थ फोटो शूट नहीं होता। सेवा का अर्थ प्रचार नहीं होता। जनसंवाद , ईंधन बचाव का अर्थ वायरल वीडियो नहीं होता।यदि सचमुच बदलाव लाना है तो नेताओं और अधिकारियों को कैमरे से ज्यादा जमीन पर ध्यान देना होगा। साइकिल चलाने से पहले सड़कें ठीक करनी होंगी। बस में बैठने से पहले सार्वजनिक परिवहन की दुर्दशा सुधारनी होगी। पैदल यात्रा से पहले नागरिकों की मूल समस्याओं का समाधान करना होगा। क्योंकि जनता को अभिनय नहीं, परिणाम चाहिए।आज जरूरत इस बात की है कि शासन और राजनीति दिखावे की संस्कृति से बाहर निकलें। वरना आने वाले समय में जनता हर तस्वीर, हर वीडियो और हर “सादगी यात्रा” को सिर्फ एक प्रायोजित दृश्य मानने लगेगी। और जिस दिन जनता का विश्वास पूरी तरह टूट गया, उस दिन कैमरे की चमक भी नेताओं और अधिकारियों की साख नहीं बचा पाएगी।


Share Now

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You cannot copy content of this page

error: Content is protected !!