साइकिल यात्रा, कैमरे और सवालों के बीच मीडिया की भूमिका।

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तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पर्यावरण संरक्षण, फिट इंडिया और ईंधन बचत जैसे अभियानों के आह्वान पर जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों द्वारा साइकिल चलाकर संदेश देने का क्रम लगातार देखा जा रहा है। इसी कड़ी में बिलासपुर सांसद एवं केंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू भी दिल्ली की सड़कों पर साइकिल चलाते नजर आए। उनके पीछे-पीछे मीडिया कर्मी कैमरे और माइक लेकर कवरेज करते दिखाई दिए। यह दृश्य केवल एक राजनीतिक या सामाजिक संदेश का प्रतीक नहीं था, बल्कि वर्तमान मीडिया व्यवस्था और उसकी प्राथमिकताओं पर भी कई सवाल खड़े करता है।तस्वीर में साफ दिखाई देता है कि जनप्रतिनिधि की साइकिल यात्रा को व्यापक मीडिया कवरेज मिल रही है। कैमरे लगातार उनका पीछा कर रहे हैं, रिपोर्टर लाइव अपडेट दे रहे हैं और वीडियो रिकॉर्डिंग के माध्यम से इस संदेश को जनता तक पहुंचाया जा रहा है। निश्चित रूप से लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों की गतिविधियों को जनता तक पहुंचाना मीडिया का दायित्व है, लेकिन इसी के साथ यह बहस भी तेज हो रही है कि क्या मीडिया केवल प्रचारात्मक गतिविधियों तक सीमित होता जा रहा है।समाज के कई वर्गों का मानना है कि यदि यही मीडिया ग्रामीण इलाकों में बदहाल सड़कें, गरीबों की समस्याएं, बेरोजगार युवाओं की पीड़ा, किसानों की परेशानियां, अस्पतालों की अव्यवस्था और सरकारी योजनाओं की जमीनी हकीकत को उसी गंभीरता से दिखाए, तो व्यवस्था में बड़ा बदलाव संभव हो सकता है। मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है और उसकी सबसे बड़ी ताकत सत्ता से सवाल पूछना तथा आम लोगों की आवाज को मंच देना है।हालांकि मीडिया जगत के जानकार यह भी मानते हैं कि वर्तमान समय में मीडिया संस्थानों पर व्यावसायिक दबाव, राजनीतिक ध्रुवीकरण और टीआरपी की प्रतिस्पर्धा का प्रभाव बढ़ा है। ऐसे माहौल में कई बार जनसरोकारों से जुड़ी खबरें पीछे छूट जाती हैं और प्रचारात्मक दृश्य ज्यादा प्रमुखता पा जाते हैं। दूसरी ओर, मीडिया का एक वर्ग आज भी लगातार जमीनी मुद्दों को उठा रहा है और भ्रष्टाचार, अव्यवस्था तथा सामाजिक समस्याओं को सामने लाने का कार्य कर रहा है।राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जनप्रतिनिधियों द्वारा साइकिल चलाना या सार्वजनिक संदेश देना गलत नहीं है, बल्कि यह सकारात्मक पहल हो सकती है। लेकिन लोकतंत्र की वास्तविक मजबूती तब दिखाई देगी जब मीडिया केवल दृश्य निर्माण तक सीमित न रहकर जनता के असली मुद्दों पर भी उतनी ही आक्रामकता और निष्पक्षता से सवाल पूछे। गरीबों की जिंदगी, गांवों की बदहाली, स्वास्थ्य और शिक्षा की चुनौतियां यदि लगातार राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनें, तो शासन-प्रशासन पर जवाबदेही स्वतः बढ़ेगी।आज आवश्यकता संतुलित पत्रकारिता की है, ऐसी पत्रकारिता जो सत्ता की सकारात्मक पहलों को भी दिखाए और जनता की पीड़ा को भी उतनी ही मजबूती से सामने रखे। क्योंकि लोकतंत्र में कैमरे केवल तस्वीरें कैद करने के लिए नहीं, बल्कि सच को उजागर करने के लिए सबसे प्रभावशाली माध्यम माने जाते हैं।


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