जय जोहार” से जीत रहे दिल : कलेक्टर कुंदन छत्तीसगढ़ी भाषा को दे रहे सम्मान।

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तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

बिलासपुर संभाग अंतर्गत मुंगेली जिले के युवा एवं ऊर्जावान कलेक्टर कुंदन कुमार इन दिनों अपनी प्रशासनिक कार्यशैली के साथ-साथ छत्तीसगढ़ी भाषा और संस्कृति के प्रति सम्मानपूर्ण व्यवहार को लेकर जनमानस के बीच विशेष चर्चा का विषय बने हुए हैं। प्रशासनिक बैठकों, जनचौपालों, सार्वजनिक कार्यक्रमों तथा आम जनता से संवाद के दौरान उनका “जय जोहार” कहकर अभिवादन करना लोगों के दिलों को छू रहा है। आमतौर पर प्रशासनिक व्यवस्था में औपचारिक भाषा और व्यवहार देखने को मिलता है, लेकिन कलेक्टर कुंदन कुमार ने अपनी सहजता और स्थानीय संस्कृति के प्रति सम्मान के माध्यम से प्रशासन और आम जनता के बीच की दूरी को कम करने का सकारात्मक प्रयास किया है। उनका छत्तीसगढ़ी भाषा में अभिवादन करना केवल एक शब्द नहीं, बल्कि प्रदेश की संस्कृति, परंपरा और मिट्टी के प्रति सम्मान का प्रतीक बन गया है।ग्रामीण क्षेत्रों में आयोजित कार्यक्रमों में जब कलेक्टर “जय जोहार” कहकर लोगों से संवाद प्रारंभ करते हैं, तब ग्रामीणों और बुजुर्गों के चेहरे पर आत्मीय मुस्कान दिखाई देती है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि पहली बार कोई वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी उनकी बोली और संस्कृति को इतनी आत्मीयता से अपनाते दिखाई दे रहे हैं। इससे लोगों में प्रशासन के प्रति विश्वास और अपनापन दोनों बढ़ा है। कलेक्टर कुंदन कुमार का यह व्यवहार न केवल प्रशासनिक संवेदनशीलता को दर्शाता है, बल्कि यह भी संदेश देता है कि आधुनिक प्रशासन तभी सफल माना जाएगा, जब वह स्थानीय संस्कृति और जनभावनाओं से जुड़कर कार्य करे।आज जब वैश्वीकरण के दौर में क्षेत्रीय भाषाएं और लोक संस्कृति धीरे-धीरे हाशिये पर जाती दिखाई दे रही हैं, ऐसे समय में मुंगेली के युवा कलेक्टर द्वारा छत्तीसगढ़ी भाषा को सम्मान देना निश्चित रूप से प्रेरणादायी पहल मानी जा रही है। आमजन के बीच यह चर्चा भी है कि यदि प्रदेश के अन्य अधिकारी और जनप्रतिनिधि भी इसी प्रकार स्थानीय भाषा और संस्कृति को सम्मान दें, तो शासन और जनता के बीच संबंध और अधिक मजबूत हो सकते हैं। मुंगेली जिले में प्रशासनिक कार्यों के साथ-साथ मानवीय संवेदनाओं और सांस्कृतिक सम्मान की यह नई मिसाल अब लोगों के बीच सकारात्मक चर्चा का विषय बन चुकी है। “जय जोहार” के माध्यम से कलेक्टर कुंदन कुमार ने यह साबित किया है कि प्रशासनिक पद की गरिमा के साथ अपनी मिट्टी और लोकसंस्कृति का सम्मान भी पूरी आत्मीयता से निभाया जा सकता है।


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