तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों एक बेहद गोपनीय मुलाकात चर्चा का विषय बनी हुई है। सूत्रों के अनुसार, हाल ही में एक प्रमोटी आईपीएस अधिकारी राज्य के एक बेहद पावरफुल अफसर से मिलने राजधानी पहुंचे थे। मुलाकात का उद्देश्य कथित तौर पर एक बड़े जिले — विशेषकर कोरबा जैसे संवेदनशील और मलाईदार जिले — की पुलिस अधीक्षक (एसपी) पोस्टिंग हासिल करना बताया जा रहा है।खोजी सूत्रों के मुताबिक, संबंधित आईपीएस अधिकारी सीधे बड़े साहब तक पहुंचने से पहले उनके बेहद प्रभावशाली निज सचिव से मिले। चर्चा के दौरान अधिकारी ने कथित रूप से अपनी इच्छा जाहिर करते हुए कहा कि उन्हें कोरबा जैसे जिले की कमान चाहिए और इसी संबंध में वे “साहब” से निवेदन करने आए हैं।सूत्र बताते हैं कि इस पर निज सचिव ने बेहद आत्मविश्वास भरे अंदाज में जवाब दिया — “आप परेशान मत होइए, जहां बोलेंगे वहां का एसपी बनवा दूंगा।”इस कथित बातचीत ने प्रशासनिक व्यवस्था में “पोस्टिंग मैनेजमेंट” और “पावर ब्रोकर सिस्टम” को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। चर्चा इस बात की भी है कि क्या अब महत्वपूर्ण जिलों की पोस्टिंग योग्यता, अनुभव और शासन की पारदर्शी प्रक्रिया से तय होती है या फिर कुछ प्रभावशाली चेहरों और उनके निजी नेटवर्क के माध्यम से?राज्य पुलिस महकमे में यह भी चर्चा है कि कुछ प्रमोटी अफसर लंबे समय से मलाईदार जिलों की दौड़ में सक्रिय हैं और इसके लिए राजनीतिक तथा नौकरशाही दोनों स्तरों पर लॉबिंग तेज हो चुकी है। जानकारों का कहना है कि कोरबा जैसे औद्योगिक और आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण जिले की एसपी पोस्टिंग हमेशा से सत्ता और सिस्टम दोनों के लिए अहम मानी जाती रही है।हालांकि इस पूरे घटनाक्रम की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन सत्ता और पुलिस मुख्यालय के गलियारों में इस चर्चा ने प्रशासनिक निष्पक्षता पर नई बहस छेड़ दी है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि किसी निज सचिव के पास इतनी ताकत है कि वह “जहां बोलेंगे वहां का एसपी बनवा दूंगा” जैसी बात कह सके, तो फिर वास्तविक निर्णय प्रक्रिया आखिर किसके हाथों में संचालित हो रही है?