तरुण कौशिक, संपादक, सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ में प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) पद की नियुक्ति को लेकर प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं। वरिष्ठ भारतीय वन सेवा अधिकारी अरुण पांडेय का नाम इस महत्वपूर्ण पद के लिए सबसे प्रबल दावेदारों में माना जा रहा है। सूत्रों के अनुसार शासन स्तर पर सहमति लगभग बन चुकी है और जल्द ही औपचारिक आदेश जारी होने की संभावना जताई जा रही है।वन विभाग में पिछले कई सप्ताह से शीर्ष स्तर पर नियुक्ति को लेकर लगातार मंथन चल रहा था। वरिष्ठता, प्रशासनिक अनुभव, विभागीय समन्वय और फील्ड स्तर पर पकड़ को देखते हुए अरुण पांडेय का नाम लगातार चर्चा में बना हुआ है। हालांकि सरकार की ओर से अब तक किसी प्रकार की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।छत्तीसगढ़ जैसे वन संपदा से समृद्ध राज्य में पीसीसीएफ का पद बेहद प्रभावशाली और संवेदनशील माना जाता है। वन संरक्षण, जैव विविधता, वन्यजीव प्रबंधन, कैम्पा फंड, वनाधिकार और बड़े प्रोजेक्ट्स से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले इसी स्तर से संचालित होते हैं। यही कारण है कि इस पद की नियुक्ति हमेशा सत्ता और सिस्टम दोनों में विशेष महत्व रखती रही है।इसी बीच राजधानी रायपुर के सत्ता और प्रशासनिक गलियारों में एक और चर्चा ने जोर पकड़ लिया है। विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार शीर्ष पद की नियुक्ति को लेकर कुछ प्रभावशाली संपर्कों, मध्यस्थों और नेटवर्क के सक्रिय होने की बातें लंबे समय से अंदरखाने में चल रही थीं।सूत्रों का दावा है कि नियुक्ति प्रक्रिया को प्रभावित करने और “ऊपर तक पहुंच” का भरोसा दिलाने के नाम पर कथित आर्थिक लेन-देन और मैनेजमेंट की चर्चाएं भी सत्ता गलियारों में होती रही हैं। हालांकि संबंधित पक्षों की ओर से इस पूरे मामले में कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है और न ही किसी स्तर पर आधिकारिक पुष्टि की गई है।प्रशासनिक हलकों में यह भी चर्चा है कि कथित तौर पर कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेज और लेन-देन से जुड़े संकेत कुछ लोगों तक पहुंच चुके हैं, जिसके बाद विभाग और सत्ता से जुड़े कई लोगों में बेचैनी देखी जा रही है। हालांकि पत्रकारिता की मर्यादा और तथ्यों की संवेदनशीलता को देखते हुए संबंधित व्यक्तियों, स्थानों अथवा अधिकारियों के नाम सार्वजनिक नहीं किए जा रहे हैं।वन विभाग से जुड़े कुछ वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि शीर्ष पदों पर नियुक्तियों के दौरान पैरवी और प्रभाव का प्रयास नई बात नहीं है, लेकिन इस बार कथित आर्थिक पहलुओं की चर्चा ने मामले को अधिक संवेदनशील बना दिया है।वहीं, यदि अरुण पांडेय के नाम पर अंतिम मुहर लगती है तो वन विभाग में व्यापक प्रशासनिक फेरबदल की संभावना भी जताई जा रही है। कई वरिष्ठ अधिकारियों की जिम्मेदारियों में बदलाव और विभागीय कार्यप्रणाली में नई प्राथमिकताओं की चर्चा शुरू हो चुकी है।इधर प्रशासनिक हलकों में यह सवाल भी उठ रहा है कि यदि शीर्ष पदों की नियुक्तियों को लेकर वास्तव में किसी प्रकार का प्रभाव, लॉबिंग या आर्थिक प्रबंधन हुआ है, तो उसकी निष्पक्ष जांच कौन करेगा। फिलहाल पूरे मामले में शासन के अंतिम आदेश और आगे होने वाले घटनाक्रम पर सभी की नजर टिकी हुई है।नोट : सर्वव्यापी इस मामले में सामने आ रही चर्चाओं और उपलब्ध दस्तावेजी संकेतों के आधार पर तथ्य जुटाने का प्रयास कर रहा है। संबंधित पक्ष यदि अपना पक्ष रखना चाहें तो उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।