भ्रष्ट अफसरों पर सिस्टम मेहरबान, जांच के नाम पर जनता से छल।

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तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ में भ्रष्टाचार अब केवल एक प्रशासनिक समस्या नहीं रह गया है, बल्कि यह व्यवस्था की कार्यशैली और राजनीतिक इच्छाशक्ति पर बड़ा सवाल बन चुका है। राज्य में आए दिन किसी न किसी विभाग में घोटाले, कमीशनखोरी, फर्जी भुगतान, निर्माण कार्यों में अनियमितता, पद का दुरुपयोग और सरकारी राशि के बंदरबांट की शिकायतें सामने आती रहती हैं। अखबारों में सुर्खियां बनती हैं, सोशल मीडिया में वीडियो और दस्तावेज वायरल होते हैं, विपक्ष बयान देता है, आम जनता आक्रोश जताती है, लेकिन कुछ दिनों बाद वही मामला फाइलों और जांच समितियों के बीच दबकर रह जाता है।स्थिति यह है कि भ्रष्टाचार के अधिकांश मामलों में कार्रवाई का पहला चरण “जांच के आदेश” तक ही सीमित रह जाता है। मुख्यमंत्री सचिवालय से लेकर मुख्य सचिव कार्यालय और विभागीय सचिवों तक शिकायतें पहुंचती हैं, संबंधित कलेक्टरों और अधिकारियों को जांच सौंपी जाती है, लेकिन महीनों और वर्षों तक जांच की अंतिम रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं होती। यदि रिपोर्ट आती भी है तो उसमें छोटे कर्मचारियों पर कार्रवाई कर बड़े जिम्मेदार अधिकारियों को बचा लिया जाता है। यही कारण है कि जनता के बीच यह धारणा लगातार मजबूत होती जा रही है कि छत्तीसगढ़ में भ्रष्ट अफसरों का कुछ नहीं बिगड़ने वाला।राज्य के कई विभागों में यह स्थिति सामान्य हो चुकी है कि शिकायत सामने आने के बाद अधिकारी पहले राजनीतिक संरक्षण तलाशते हैं, फिर तकनीकी नियमों और प्रक्रियाओं का जाल बुनकर स्वयं को सुरक्षित कर लेते हैं। जांच अधिकारी बदलते रहते हैं, फाइलें इधर-उधर घूमती रहती हैं और धीरे-धीरे पूरा मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है। इस बीच जिन लोगों ने भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाई होती है, उन्हें ही मानसिक दबाव, प्रशासनिक प्रताड़ना और राजनीतिक उपेक्षा का सामना करना पड़ता है।सबसे चिंताजनक बात यह है कि अब जनता का भरोसा जांच प्रणाली से कमजोर होता दिखाई दे रहा है। लोगों को लगता है कि भ्रष्टाचार के मामलों में कार्रवाई केवल दिखावे के लिए की जाती है ताकि सरकार और विभाग यह कह सकें कि शिकायत पर संज्ञान लिया गया है। लेकिन वास्तविकता में न तो करोड़ों की सरकारी राशि वापस आती है और न ही बड़े अधिकारियों की जवाबदेही तय होती है। यही कारण है कि भ्रष्टाचार करने वालों के हौसले लगातार बुलंद होते जा रहे हैं।छत्तीसगढ़ में पंचायत से लेकर मंत्रालय तक कई ऐसे मामले सामने आए, जिनमें गंभीर वित्तीय अनियमितताओं के दस्तावेज सार्वजनिक हुए, परंतु कार्रवाई की गति इतनी धीमी रही कि जनता का ध्यान ही दूसरी ओर चला गया। कई मामलों में जांच एजेंसियां वर्षों तक केवल दस्तावेज एकत्र करने में लगी रहीं, जबकि आरोपित अधिकारी पदोन्नति और मलाईदार पदों का लाभ उठाते रहे। इससे यह संदेश गया कि व्यवस्था में ईमानदार से अधिक ताकतवर वह व्यक्ति है जिसके पास राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण हो।सोशल मीडिया और डिजिटल पत्रकारिता के दौर में अब भ्रष्टाचार छिपाना पहले जितना आसान नहीं रहा, लेकिन कार्रवाई का अभाव व्यवस्था पर और अधिक सवाल खड़े कर रहा है। आम नागरिक पूछ रहा है कि यदि हर शिकायत के बाद जांच होती है तो दोषियों को सजा क्यों नहीं मिलती? यदि भ्रष्टाचार साबित नहीं होता तो शिकायतों में सामने आए दस्तावेज और तथ्य झूठे कैसे साबित हो जाते हैं? और यदि भ्रष्टाचार साबित होता है तो फिर बड़े अधिकारियों पर कठोर कार्रवाई क्यों नहीं होती?राजनीतिक दल सत्ता में रहते हुए भ्रष्टाचार पर सख्त कार्रवाई का दावा करते हैं, लेकिन विपक्ष में जाते ही वही पुराने मामलों को लेकर सरकार को घेरने लगते हैं। इससे जनता के बीच यह संदेश जाता है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई भी अब राजनीतिक सुविधा का विषय बन गई है। शासन बदलता है, चेहरे बदलते हैं, लेकिन जांच और कार्रवाई की गति नहीं बदलती।आज आवश्यकता केवल जांच समितियां बनाने की नहीं, बल्कि समयबद्ध और पारदर्शी कार्रवाई की है। जब तक भ्रष्टाचार के मामलों में बड़े अधिकारियों और प्रभावशाली लोगों पर कठोर एवं सार्वजनिक कार्रवाई नहीं होगी, तब तक “जांच जारी है” जैसे शब्द जनता के लिए केवल औपचारिकता बनकर रह जाएंगे। छत्तीसगढ़ की जनता अब कागजी जांच नहीं, बल्कि परिणाम चाहती है।


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