आरटीआई पर घिरा जनसंपर्क विभाग, अधूरी जानकारी और खर्च छुपाने के आरोपों से मचा हड़कंप।

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भागवत प्रसाद, ब्यूरो चीफ सर्वव्यापी

बिलासपुर जिला जनसंपर्क कार्यालय इन दिनों सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 से जुड़े दो मामलों को लेकर चर्चा में है। जनसूचना अधिकारी मुनूदाउ पटेल (उप संचालक) की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठे हैं। प्रथम अपीलीय अधिकारी के आदेश सामने आने के बाद विभाग में हलचल तेज हो गई है।पहले मामले में पत्रकार पंकज खंडेलवाल ने वर्ष 2024-25 और 2025-26 के दौरान शासकीय आयोजनों में पत्रकारों एवं अन्य लोगों के लिए कराए गए नाश्ता, चाय और भोजन पर हुए खर्च के बिल-वाउचर की प्रमाणित प्रतियां मांगी थीं। जवाब में जनसूचना अधिकारी ने कहा कि पत्रकारों और अन्य लोगों की अलग-अलग श्रेणी नहीं है तथा बिल-वाउचर में बैंक खाते की जानकारी होने के कारण दस्तावेज निजी सूचना की श्रेणी में आते हैं।इसके बाद मामला विवादों में आ गया। अपीलकर्ता ने आरोप लगाया कि विभाग जानबूझकर जानकारी छुपा रहा है और आरटीआई कानून की गलत व्याख्या की जा रही है। सुनवाई के दौरान यह सामने आया कि वित्तीय वर्ष 2024-25 में पत्रकार सत्कार के लिए 3 लाख 83 हजार 808 रुपये स्वीकृत हुए थे, जबकि 3 लाख 39 हजार 303 रुपये खर्च किए जा चुके हैं। इसके बावजूद बिल-वाउचर उपलब्ध नहीं कराए गए।दूसरे प्रकरण में जिला जनसंपर्क कार्यालय में कार्यरत न्यूज़ एजेंसी, न्यूज़ सर्विस और आउटसोर्सिंग एजेंसी के माध्यम से रखे गए कंप्यूटर ऑपरेटरों से संबंधित अभिलेख मांगे गए थे। इस पर जनसूचना अधिकारी ने जानकारी को “तृतीय पक्ष” बताते हुए देने से इनकार कर दिया। हालांकि सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि विभाग के पास कार्यरत कंप्यूटर ऑपरेटरों का व्यवस्थित रिकॉर्ड ही उपलब्ध नहीं है, क्योंकि नियुक्तियां कथित रूप से संबंधित एजेंसियों के माध्यम से की जाती हैं।प्रथम अपीलीय अधिकारी संजीव तिवारी ने आदेश जारी कर जिला जनसंपर्क कार्यालय को स्वीकृत न्यूज़ एजेंसियों के नाम उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं। आदेश के बाद विभागीय रिकॉर्ड, भुगतान प्रक्रिया और एजेंसियों की भूमिका को लेकर अंदरूनी चर्चा तेज हो गई है।इन दोनों मामलों ने सरकारी विभागों में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। सरकारी खर्च से जुड़े बिल-वाउचर सार्वजनिक क्यों नहीं किए जा रहे, विभाग में कार्यरत आउटसोर्स कर्मचारियों का रिकॉर्ड स्पष्ट क्यों नहीं है, और क्या आरटीआई आवेदनों को तकनीकी धाराओं में उलझाकर जानकारी रोकी जा रही है , अब यही चर्चा का विषय बना हुआ है।


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