वायरल रील्स की राजनीति”: सोशल मीडिया पर आरोपों की बाढ़, सवालों के घेरे में विष्णु सरकार..?

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तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ की राजनीति, प्रशासन और सिस्टम पर इन दिनों सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर वायरल हो रही रील्स और वीडियो ने नई बहस छेड़ दी है। अलग-अलग डिजिटल प्लेटफॉर्म और लोकल मीडिया पेजों पर प्रसारित हो रहे वीडियो कंटेंट में कहीं विपक्षी विधायक की एंट्री को लेकर प्रशासन पर सवाल उठाए जा रहे हैं, तो कहीं मुख्यमंत्री के काफिले, ट्रैफिक पुलिस की कथित वसूली और स्वास्थ्य विभाग में कमीशनखोरी जैसे गंभीर आरोप चर्चा का विषय बने हुए हैं।

सोशल मीडिया पर वायरल इन वीडियो ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या अब जनमत का बड़ा मंच पारंपरिक मीडिया नहीं बल्कि “रील पॉलिटिक्स” बनता जा रहा है?

पहले वायरल वीडियो में जनचौपाल कार्यक्रम के दौरान विपक्षी विधायक की एंट्री को लेकर बवाल दिखाया गया है। वीडियो में प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े करते हुए लोकतांत्रिक अधिकारों को दबाने के आरोप लगाए गए हैं। इसमें कलेक्टर और एसपी की भूमिका पर भी तीखी टिप्पणियां दिखाई गईं। इस वायरल कंटेंट ने राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज कर दी कि क्या प्रशासनिक निष्पक्षता अब जनता की निगाह में कटघरे में खड़ी होती जा रही है।

दूसरे वायरल वीडियो में प्रधानमंत्री की अपील और वीआईपी संस्कृति को लेकर सवाल उठाए गए हैं। वीडियो में दावा किया गया कि मुख्यमंत्री के काफिले में बड़ी संख्या में वाहन दौड़ते दिखाई दिए। इसे लेकर सोशल मीडिया यूजर्स दो हिस्सों में बंटे नजर आए। एक वर्ग इसे सुरक्षा प्रोटोकॉल का हिस्सा बता रहा है, जबकि दूसरा वर्ग इसे “सादगी की राजनीति” के विपरीत बताकर आलोचना कर रहा है।

तीसरे वायरल वीडियो में अंबिकापुर के ट्रैफिक सिस्टम पर सवाल उठाते हुए कथित वसूली का मुद्दा उछाला गया। वीडियो में दावा किया गया कि गरीब और आम वाहन चालकों को निशाना बनाया जाता है। हालांकि वीडियो में लगाए गए आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इसने स्थानीय स्तर पर पुलिस व्यवस्था और ट्रैफिक प्रबंधन पर बहस छेड़ दी है।

इसी क्रम में एक अन्य वायरल वीडियो में स्वास्थ्य मंत्री को लेकर “40 प्रतिशत कमीशन” जैसे गंभीर आरोपों वाली हेडलाइन सोशल मीडिया पर तेजी से प्रसारित हुई। राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में इस तरह की वायरल सामग्री को लेकर चिंता भी जताई जा रही है, क्योंकि बिना आधिकारिक जांच और दस्तावेजी पुष्टि के ऐसे आरोप जनधारणा को प्रभावित कर सकते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि सोशल मीडिया ने आम नागरिक को आवाज जरूर दी है, लेकिन इसके साथ “ट्रायल बाय वायरल वीडियो” का खतरा भी बढ़ा है। कई बार अधूरी जानकारी, संपादित वीडियो और आक्रामक हेडलाइन जनमत को प्रभावित करती हैं। दूसरी ओर, यह भी सच है कि कई मुद्दे पहले सोशल मीडिया पर उठे और बाद में प्रशासन को कार्रवाई करनी पड़ी।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, आने वाले समय में सरकार, प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती केवल काम करना नहीं, बल्कि “डिजिटल धारणा” को भी संभालना होगी। क्योंकि अब हर घटना का फैसला सिर्फ जमीन पर नहीं, बल्कि मोबाइल स्क्रीन पर भी लिखा जा रहा है।


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