नियमों का रौब या सत्ता को चुनौती?”भाजपा नेताओं की मौजूदगी में अपर कलेक्टर के तेवर से मचा हड़कंप।

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तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

नगर निगम चुनाव के नामांकन प्रक्रिया के दौरान एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया जिसने प्रशासनिक व्यवहार, सत्ता और संवेदनशीलता—तीनों पर सवाल खड़े कर दिए। वार्ड क्रमांक 29 से भाजपा प्रत्याशी मधुसूदन राव के नामांकन दाखिले के दौरान भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं की भीड़ को देखकर अपर कलेक्टर एवं रिटर्निंग अधिकारी ज्योति पटेल अचानक सख्त तेवर में नजर आईं। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार जैसे ही बड़ी संख्या में भाजपा पदाधिकारी और कार्यकर्ता नामांकन कक्ष में पहुंचे, अधिकारी भड़क गईं और ऊंची आवाज में कहा—“सिर्फ पांच लोग अंदर आएंगे, बाकी सब बाहर जाइए… नहीं तो फार्म नहीं लिया जाएगा।”बताया जा रहा है कि अधिकारी ने तत्काल नामांकन फार्म वापस कर दिया और कमरे में मौजूद सभी लोगों को बाहर निकलने के निर्देश दिए। कुछ देर तक माहौल तनावपूर्ण बना रहा। कमरे के भीतर मौजूद भाजपा कार्यकर्ता, पदाधिकारी और समर्थक अचानक हुए इस व्यवहार से हतप्रभ रह गए। वहां मौजूद लोग एक-दूसरे का चेहरा देखते रह गए, जबकि अधिकारी लगातार व्यवस्था और नियमों का हवाला देती रहीं। बाद में भीड़ कम होने पर ही नामांकन फार्म स्वीकार किया गया।इस पूरे घटनाक्रम ने राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज कर दी है। भाजपा नेताओं के बीच यह सवाल उठ रहा है कि क्या नियमों की आड़ में जनप्रतिनिधियों और कार्यकर्ताओं के साथ इस तरह का व्यवहार उचित है? खासतौर पर तब, जब प्रदेश के मुख्यमंत्री लगातार अधिकारियों को जनता और जनप्रतिनिधियों से शालीन व्यवहार करने की नसीहत देते रहे हैं।राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी तेज है कि प्रदेश में “ट्रिपल इंजन सरकार” होने के बावजूद कई अधिकारी खुद को सत्ता और जनप्रतिनिधियों से ऊपर समझने लगे हैं। भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच यह संदेश गया कि संगठन और सरकार की मौजूदगी के बावजूद प्रशासनिक अमला अपनी अलग कार्यशैली में काम कर रहा है। कई लोगों ने इसे “अत्यधिक प्रशासनिक अहंकार” बताया, तो कुछ ने नियम पालन की मजबूरी कहकर अधिकारी का समर्थन भी किया।नामांकन के दौरान भाजपा जिला अध्यक्ष दीपक ठाकुर, महापौर पूजा विधानी, मनीष अग्रवाल, किशोर राय सहित बड़ी संख्या में भाजपा कार्यकर्ता मौजूद थे। हालांकि पूरे घटनाक्रम के बाद वहां मौजूद नेताओं और कार्यकर्ताओं में नाराजगी साफ दिखाई दी। अब यह मामला प्रशासनिक सख्ती बनाम व्यवहारिक संवेदनशीलता की बहस का विषय बनता जा रहा है।


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