तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

बिलासपुर संभाग अंर्तगत गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिला लंबे समय से अपनी समृद्ध वन संपदा और वन्यजीवों के लिए जाना जाता रहा है। विशेष रूप से मरवाही क्षेत्र को भालुओं का गढ़ माना जाता है, जहां बड़ी संख्या में भालू प्राकृतिक आवास में निवास करते हैं। वहीं हाथियों की लगातार आवाजाही भी इस क्षेत्र को वन्यजीवों की दृष्टि से बेहद संवेदनशील बनाती है। हाल के वर्षों में जंगलों से निकलकर भालुओं और हाथियों का सड़कों तथा रिहायशी इलाकों तक पहुंचना आम बात हो गई है, जिससे वन विभाग के सामने नई चुनौतियां खड़ी हुई हैं।बीते दिनों मरवाही क्षेत्र में एक दुर्लभ सफेद भालू के रिहायशी इलाके में दिखाई देने के बाद यह जिला एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया। वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि जंगलों में भोजन और पानी की उपलब्धता, मानव गतिविधियों का विस्तार तथा वन्यजीवों के प्राकृतिक मार्गों में बढ़ते हस्तक्षेप के कारण जानवर आबादी वाले क्षेत्रों की ओर रुख कर रहे हैं। ऐसे हालात में वन विभाग की जिम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती है।वन मंडलाधिकारी (डीएफओ) ग्रीष्मी चांद का कहना है कि विभाग का मुख्य उद्देश्य जंगली जानवरों को उनके प्राकृतिक आवास में सुरक्षित रखना और मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करना है। उनके नेतृत्व में वन विभाग लगातार निगरानी, जनजागरूकता और वन्यजीव संरक्षण संबंधी गतिविधियों को प्राथमिकता दे रहा है। संवेदनशील क्षेत्रों में विशेष टीमों की तैनाती, ग्रामीणों को सतर्क करने की व्यवस्था तथा वन्यजीवों की गतिविधियों पर लगातार नजर रखने जैसे कदम उठाए जा रहे हैं।डीएफओ ग्रीष्मी चांद का मानना है कि वन्यजीवों का संरक्षण केवल वन विभाग की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज की भी साझी जिम्मेदारी है। यदि जंगल सुरक्षित रहेंगे तो वन्यजीव भी अपने प्राकृतिक आवास में सुरक्षित रहेंगे और रिहायशी क्षेत्रों में उनके आने की घटनाएं स्वतः कम होंगी। उन्होंने स्थानीय लोगों से भी अपील की है कि वन्यजीव दिखाई देने पर घबराने के बजाय तत्काल वन विभाग को सूचना दें तथा किसी प्रकार की छेड़छाड़ या भीड़ एकत्रित करने से बचें।विशेषज्ञों का मानना है कि मरवाही जैसे वन क्षेत्रों में संरक्षण और विकास के बीच संतुलन बनाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। वर्तमान परिस्थितियों में वन विभाग द्वारा किए जा रहे प्रयास यह संकेत देते हैं कि प्रशासन वन्यजीव संरक्षण को गंभीरता से ले रहा है। यदि इसी प्रकार समन्वित प्रयास जारी रहे तो मरवाही भविष्य में वन्यजीव संरक्षण के एक आदर्श मॉडल के रूप में स्थापित हो सकता है।वन संपदा, जैव विविधता और दुर्लभ वन्यजीवों की मौजूदगी के कारण मरवाही की पहचान केवल एक भौगोलिक क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ की प्राकृतिक धरोहर का महत्वपूर्ण केंद्र है। ऐसे में डीएफओ ग्रीष्मी चांद के नेतृत्व में चल रहे संरक्षण प्रयास न केवल वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रकृति की इस अमूल्य विरासत को सुरक्षित रखने की दिशा में भी एक सार्थक पहल साबित हो रहे हैं।