तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती पहले से कहीं अधिक गंभीर हो गई है। प्रदेश में हर वर्ष करोड़ों रुपये वृक्षारोपण के नाम पर खर्च किए जाते हैं, सरकारें लाखों पौधे लगाने के दावे करती हैं, वन संरक्षण और हरित विकास की बातें की जाती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है। यदि वास्तव में इतने बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण हुआ होता और लगाए गए पौधे जीवित होते, तो आज छत्तीसगढ़ के अधिकांश क्षेत्रों में भीषण गर्मी, जल संकट और पर्यावरणीय असंतुलन की स्थिति इतनी भयावह नहीं होती।आज प्रदेश के कई जिलों में तापमान लगातार नए रिकॉर्ड बना रहा है। शहरों में कंक्रीट के जंगल बढ़ रहे हैं और गांवों में भी हरियाली का दायरा सिकुड़ता जा रहा है। जंगलों की कटाई विकास और औद्योगिक परियोजनाओं के नाम पर जारी है, लेकिन इसके बदले किए जा रहे वृक्षारोपण की वास्तविक स्थिति का निष्पक्ष मूल्यांकन शायद ही कभी सामने आता हो। सवाल यह है कि जब हर वर्ष करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, तो वे पेड़ कहां हैं जो पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में मदद करते? आखिर क्यों अधिकांश स्थानों पर लगाए गए पौधे कुछ महीनों बाद ही सूख जाते हैं? और यदि पौधे जीवित नहीं रह पा रहे हैं, तो उनकी जिम्मेदारी किसकी तय की गई?वास्तविकता यह है कि वृक्षारोपण का बड़ा हिस्सा कई बार केवल सरकारी आंकड़ों और फाइलों तक सीमित दिखाई देता है। मानसून आते ही बड़े-बड़े अभियान चलाए जाते हैं, फोटो सेशन होते हैं, अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों द्वारा पौधे लगाए जाते हैं, लेकिन पौधों के संरक्षण और देखरेख की व्यवस्था कमजोर पड़ जाती है। परिणामस्वरूप करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद धरती पर हरियाली बढ़ने के बजाय घटती नजर आती है। यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि सार्वजनिक धन और पर्यावरण दोनों के साथ गंभीर अन्याय है।सरकार को यह स्वीकार करना होगा कि केवल पौधे लगाने की संख्या बताकर पर्यावरण संरक्षण का दावा नहीं किया जा सकता। सफलता का वास्तविक पैमाना यह होना चाहिए कि लगाए गए पौधों में कितने वृक्ष बन पाए और कितने वर्षों तक जीवित रहे। जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक वृक्षारोपण अभियान केवल औपचारिकता बनकर रह जाएंगे और पर्यावरणीय संकट लगातार गहराता जाएगा।हालांकि इस संकट के लिए केवल सरकार को दोषी ठहराकर समाज अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता। आम नागरिकों की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। आज तेजी से बहुमंजिला इमारतें और आधुनिक कॉलोनियां बन रही हैं, लेकिन उनमें हरियाली और खुले स्थानों का अभाव दिखाई देता है। लोग अपने घरों की भव्यता बढ़ाने में रुचि दिखाते हैं, लेकिन पेड़ लगाने और उन्हें संरक्षित करने की संस्कृति कमजोर होती जा रही है। यह प्रवृत्ति भविष्य के लिए खतरे की घंटी है।पेड़ों की कमी का सीधा असर जल स्रोतों पर भी पड़ रहा है। भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है। कई स्थानों पर गर्मी के मौसम में पेयजल संकट आम बात हो गई है। यदि यही स्थिति बनी रही, तो आने वाले पांच वर्षों में जल संकट विकराल रूप ले सकता है। विशेषज्ञों की चेतावनी है कि जलवायु परिवर्तन और वनों की कटाई का संयुक्त प्रभाव भविष्य में और अधिक गंभीर होगा। तब केवल गर्मी ही नहीं, बल्कि स्वच्छ हवा और पर्याप्त पानी भी लोगों के लिए संघर्ष का विषय बन सकता है।आज आवश्यकता सरकार की घोषणाओं और जमीनी परिणामों के बीच की दूरी को समाप्त करने की है। वृक्षारोपण योजनाओं का स्वतंत्र सामाजिक और तकनीकी ऑडिट होना चाहिए। जिन क्षेत्रों में पौधे सूख गए हैं, वहां जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। वन भूमि की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए और औद्योगिक विकास के साथ पर्यावरणीय संतुलन सुनिश्चित करने के लिए कठोर मानदंड लागू किए जाने चाहिए।छत्तीसगढ़ की पहचान उसके जंगलों, नदियों और प्राकृतिक संपदा से है। यदि यही पहचान धीरे-धीरे समाप्त होती गई, तो विकास के बड़े-बड़े दावे भी खोखले साबित होंगे। आज प्रदेश की तपती धरती, सूखते जल स्रोत और बढ़ता तापमान सरकार से एक ही सवाल पूछ रहे हैं—जब करोड़ों रुपये हरियाली के नाम पर खर्च हुए, तो फिर छत्तीसगढ़ इतना गर्म क्यों हो रहा है? इस सवाल का जवाब केवल आंकड़ों से नहीं, बल्कि धरातल पर दिखाई देने वाली हरियाली से देना होगा। क्योंकि यदि आज भी चेतने में देर हुई, तो आने वाली पीढ़ियों को न पर्याप्त पानी मिलेगा, न शुद्ध हवा और न ही वह प्राकृतिक छत्तीसगढ़, जिसकी पहचान कभी पूरे देश में मिसाल मानी जाती थी।