तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
देश में बढ़ती महंगाई आज आम नागरिक के लिए सबसे बड़ी चिंताओं में से एक बन चुकी है। रसोई गैस, खाद्य तेल, दाल, सब्जियां, पेट्रोल-डीजल और दैनिक उपयोग की वस्तुओं की बढ़ती कीमतों ने मध्यम वर्ग और गरीब परिवारों का घरेलू बजट पूरी तरह बिगाड़ दिया है। दूसरी ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लगातार विदेश यात्राएं भी राजनीतिक और सामाजिक बहस का विषय बनी हुई हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या इन विदेश यात्राओं का प्रत्यक्ष लाभ आम जनता तक पहुंच रहा है या नहीं।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने कार्यकाल में अनेक देशों का दौरा किया है। सरकार का तर्क है कि इन यात्राओं के माध्यम से भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा बढ़ी है, विदेशी निवेश आकर्षित हुआ है, व्यापारिक संबंध मजबूत हुए हैं और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की भूमिका पहले से अधिक प्रभावशाली बनी है। विदेश नीति के जानकार भी मानते हैं कि भारत आज वैश्विक राजनीति में पहले की तुलना में अधिक मजबूत स्थिति में खड़ा दिखाई देता है।लेकिन दूसरी ओर विपक्ष और कई सामाजिक संगठनों का कहना है कि विदेश नीति की उपलब्धियों का वास्तविक मूल्यांकन जनता की आर्थिक स्थिति से होना चाहिए। यदि देश में बेरोजगारी, महंगाई और किसानों की समस्याएं लगातार बनी हुई हैं तो केवल अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बढ़ती प्रतिष्ठा को विकास का पूर्ण पैमाना नहीं माना जा सकता।महंगाई का सबसे अधिक असर गरीब और मध्यम वर्ग पर पड़ रहा है। एक ओर आय के स्रोत सीमित हैं, वहीं दूसरी ओर आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में लगातार वृद्धि देखी जा रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि लागत बढ़ रही है, जबकि किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है। शहरी क्षेत्रों में किराया, शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवहन का खर्च भी तेजी से बढ़ा है।विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक परिस्थितियां, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें, युद्ध और आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान जैसी कई वजहें महंगाई के लिए जिम्मेदार हैं। हालांकि सरकार की आर्थिक नीतियां भी इस पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालती हैं। इसलिए जनता यह अपेक्षा करती है कि विदेश यात्राओं से प्राप्त निवेश और व्यापारिक समझौतों का लाभ रोजगार सृजन, उद्योग विस्तार और महंगाई नियंत्रण के रूप में दिखाई दे।राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार लोकतंत्र में सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी नागरिकों के जीवन स्तर को बेहतर बनाना है। यदि जनता को रोजगार, सस्ती शिक्षा, सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं और महंगाई से राहत नहीं मिलती, तो विदेश नीति की सफलताओं पर भी प्रश्न उठना स्वाभाविक है। वहीं सरकार समर्थकों का कहना है कि मजबूत अंतरराष्ट्रीय संबंधों का लाभ दीर्घकाल में देश की अर्थव्यवस्था को मिलता है और इसके परिणाम धीरे-धीरे दिखाई देते हैं।कुल मिलाकर महंगाई और विदेश यात्राओं को लेकर देश में दो अलग-अलग दृष्टिकोण दिखाई देते हैं। एक पक्ष इसे भारत की बढ़ती वैश्विक ताकत और आर्थिक अवसरों से जोड़कर देखता है, जबकि दूसरा पक्ष आम नागरिक की रोजमर्रा की परेशानियों के आधार पर सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाता है। आने वाले समय में सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि वैश्विक मंचों पर मिली उपलब्धियां देश के अंतिम व्यक्ति तक कितनी पहुंचती हैं और क्या आम जनता को महंगाई से वास्तविक राहत मिल पाती है या नहीं।