तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ मंत्रालय में प्रस्तावित एक पदोन्नति प्रक्रिया को लेकर कर्मचारियों के बीच असंतोष और सवालों का दौर शुरू हो गया है। विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, सामान्य प्रशासन विभाग के अंतर्गत मंत्रालय स्थित ग्रंथालय में कार्यरत बुक बाइंडर एवं बुक असिस्टेंट जैसे पदों से कर्मचारियों को पदोन्नत कर लिपिकीय (बाबू) पदों पर पदस्थ करने की तैयारी चल रही है। इस प्रस्तावित प्रक्रिया को लेकर कर्मचारी वर्ग का एक बड़ा तबका इसे सेवा नियमों और पदोन्नति व्यवस्था की मूल भावना के विपरीत बता रहा है।सूत्रों का दावा है कि बुक बाइंडर और बुक असिस्टेंट के पद मूल रूप से एक अलग तकनीकी एवं सहायक श्रेणी के अंतर्गत आते हैं, जिन्हें लंबे समय से नॉन-प्रमोटेबल पद माना जाता रहा है। यदि इन पदों पर कार्यरत कर्मचारियों को पदोन्नति दी भी जाती है तो वह उनके नियुक्ति चैनल और संवर्ग के भीतर ही होना चाहिए। लेकिन वर्तमान में जिस प्रकार उन्हें सीधे लिपिकीय संवर्ग में शामिल करने की चर्चा चल रही है, उसने कई गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।कर्मचारियों का कहना है कि यदि यह प्रस्ताव अमल में आता है तो इसका सीधा असर उन कर्मचारियों पर पड़ेगा जो वर्षों से बाबू वर्ग में पदोन्नति की प्रतीक्षा कर रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, इस प्रक्रिया से भविष्य में पदोन्नत होने वाले कर्मचारियों के कम से कम दो पद प्रभावित हो सकते हैं, जिससे वरिष्ठता और पदोन्नति का पूरा संतुलन बिगड़ सकता है।मंत्रालय के जानकारों का कहना है कि शासन की सेवा संरचना में प्रत्येक पद और संवर्ग के लिए अलग-अलग भर्ती एवं पदोन्नति नियम निर्धारित किए गए हैं। ऐसे में किसी अन्य संवर्ग के कर्मचारियों को सीधे लिपिकीय पदों पर पदोन्नत करना भविष्य में कानूनी विवादों और प्रशासनिक चुनौतियों को जन्म दे सकता है। यही कारण है कि मंत्रालय के भीतर इस मुद्दे पर चर्चा तेज हो गई है।विपक्षी दलों और कर्मचारी संगठनों के कुछ पदाधिकारियों ने भी इस मामले को गंभीर बताते हुए राज्य सरकार से स्पष्ट स्थिति सामने रखने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि पदोन्नति नियमों में कोई बदलाव किया जा रहा है तो उसे पारदर्शी तरीके से सार्वजनिक किया जाए और प्रभावित कर्मचारियों की आपत्तियां भी सुनी जाएं।कर्मचारी वर्ग का कहना है कि शासन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि “जो जिस चैनल और संवर्ग का कर्मचारी है, उसे उसी चैनल के नियमों के अनुसार अवसर मिले।” अन्यथा वर्षों से पदोन्नति की प्रतीक्षा कर रहे कर्मचारियों के अधिकार प्रभावित होंगे और मंत्रालय में असंतोष का वातावरण पैदा हो सकता है।अब देखना यह होगा कि राज्य सरकार इस विवादास्पद पदोन्नति प्रक्रिया पर क्या रुख अपनाती है और कर्मचारियों द्वारा उठाए जा रहे सवालों का जवाब किस प्रकार देती है। फिलहाल मंत्रालय की गलियारों में यह मामला चर्चा का प्रमुख विषय बना हुआ है और कर्मचारी वर्ग शासन से निष्पक्ष एवं नियमसम्मत निर्णय की अपेक्षा कर रहा है।