तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ सहित देशभर में राजस्व प्रशासन की रीढ़ माने जाने वाले तहसीलदार और नायब तहसीलदार आज ऐसी प्रशासनिक संरचना में काम कर रहे हैं, जहां उनसे एक साथ दर्जनों विभागों की जिम्मेदारियां निभाने की अपेक्षा की जा रही है। राजस्व विवादों के निपटारे से लेकर कानून व्यवस्था, चुनाव, जनगणना, प्रमाण पत्र, अवैध उत्खनन पर कार्रवाई, कृषि मंडी निरीक्षण, वीआईपी ड्यूटी, प्राकृतिक आपदा प्रबंधन और शासन की आकस्मिक बैठकों तक—हर मोर्चे पर सबसे पहले तहसील कार्यालय को ही खड़ा किया जाता है।जमीनी स्तर पर पड़ताल करने पर यह सवाल तेजी से उभर रहा है कि आखिर क्या एक ही अधिकारी से इतनी विविध और भारी जिम्मेदारियों का निर्वहन निष्पक्ष, प्रभावी और समयबद्ध तरीके से संभव है?राजस्व विभाग से जुड़े सूत्रों का कहना है कि तहसीलदार अब केवल राजस्व अधिकारी नहीं रह गए हैं, बल्कि उन्हें “मल्टीटास्क प्रशासनिक मशीन” बना दिया गया है। सुबह न्यायालयीन प्रकरणों की सुनवाई, दोपहर में कानून व्यवस्था की बैठक, शाम को अवैध खनन या अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई और रात में वीआईपी दौरा या आकस्मिक निरीक्षण—यही वर्तमान कार्यशैली बन चुकी है।सबसे गंभीर पहलू यह है कि जनता को सबसे अधिक सीधा संपर्क तहसील कार्यालय से ही होता है। जाति, निवास, आय, जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र से लेकर जमीन सीमांकन, नामांतरण, बंटवारा, भू-अधिकार, फसल गिरदावरी और मुआवजा जैसे मामलों में आम नागरिक की उम्मीदें इसी कार्यालय पर टिकी रहती हैं। लेकिन जब एक अधिकारी को एक साथ इतने मोर्चों पर लगाया जाएगा, तो न्यायिक और राजस्व कार्यों की गुणवत्ता प्रभावित होना स्वाभाविक है।सूत्रों के अनुसार कई तहसीलों में वर्षों से पर्याप्त स्टाफ नहीं है। पटवारी, राजस्व निरीक्षक और लिपिक स्तर पर रिक्त पदों के बावजूद फाइलों का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। कई स्थानों पर डिजिटल व्यवस्था अधूरी है, इंटरनेट और तकनीकी संसाधनों की कमी अलग समस्या है। इसके बावजूद समय-सीमा में कार्य पूरा करने का दबाव अधिकारियों पर बना रहता है।प्रशासनिक हलकों में यह चर्चा भी तेज है कि शासन की लगभग हर प्राथमिक योजना और आकस्मिक अभियान का पहला भार तहसील स्तर पर ही डाल दिया जाता है। चाहे लोकसभा-विधानसभा चुनाव हों, पंचायत चुनाव, जनगणना, आपदा राहत, धान खरीदी, अवैध रेत उत्खनन पर कार्रवाई या फिर वीआईपी प्रोटोकॉल—हर जगह तहसीलदार की मौजूदगी अनिवार्य मानी जाती है।खोजी पड़ताल में यह तथ्य भी सामने आया कि कई तहसील कार्यालयों में न्यायालयीन प्रकरण वर्षों तक लंबित पड़े हैं। कारण केवल लापरवाही नहीं, बल्कि अत्यधिक कार्यभार भी बताया जा रहा है। एक ओर अधिकारी से न्यायिक निष्पक्षता की अपेक्षा की जाती है, वहीं दूसरी ओर उसे राजनीतिक, प्रशासनिक और कानून व्यवस्था संबंधी दबावों में भी लगातार काम करना पड़ता है।विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो राजस्व न्याय व्यवस्था की निष्पक्षता और गति दोनों प्रभावित होंगी। क्योंकि एक ऐसा अधिकारी, जो दिनभर विभागीय बैठकों, धरना-प्रदर्शन, निरीक्षण, चुनावी कार्य और आकस्मिक ड्यूटी में व्यस्त रहेगा, उससे संवेदनशील भूमि विवादों और न्यायालयीन मामलों में गहन अध्ययन आधारित निर्णय की अपेक्षा करना व्यवहारिक नहीं माना जा सकता।ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और भी चिंताजनक बताई जा रही है। किसानों के सीमांकन, मुआवजा, बंटवारा और नामांतरण जैसे मामलों में महीनों की देरी आम बात बन चुकी है। कई आवेदक बार-बार तहसील कार्यालय के चक्कर काटने को मजबूर हैं। दूसरी ओर अधिकारी वर्ग का तर्क है कि उपलब्ध संसाधनों और स्टाफ के अनुपात में उन पर जिम्मेदारियों का बोझ कई गुना बढ़ चुका है।राजस्व प्रशासन से जुड़े सेवानिवृत्त अधिकारियों का कहना है कि पहले तहसीलदार मुख्यतः राजस्व और न्यायिक कार्यों तक सीमित रहते थे, लेकिन अब उन्हें “ऑल इन वन फील्ड एडमिनिस्ट्रेटर” बना दिया गया है। इससे न केवल कार्य की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है, बल्कि अधिकारियों पर मानसिक दबाव भी बढ़ रहा है।सबसे बड़ा सवाल अब यही है कि क्या शासन तहसील स्तर पर बढ़ते कार्यभार के अनुरूप संसाधन, अतिरिक्त स्टाफ और तकनीकी ढांचा उपलब्ध करा पाएगा? या फिर राजस्व प्रशासन इसी तरह जिम्मेदारियों के बोझ तले दबता रहेगा?क्योंकि हकीकत यही है कि जब एक ही अधिकारी से न्यायालय, प्रशासन, कानून व्यवस्था, चुनाव, जनकल्याण और आपदा प्रबंधन सब कुछ संभालने की अपेक्षा की जाएगी, तब कहीं न कहीं व्यवस्था की मूल आत्मा प्रभावित होगी। और इसका सीधा असर आम जनता पर पड़ेगा, जो आज भी अपने सबसे छोटे लेकिन सबसे महत्वपूर्ण सरकारी काम के लिए तहसील कार्यालय की ओर उम्मीद से देखती है।