तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ की न्यायधानी बिलासपुर संभाग अंतर्गत एक जिले में पदस्थ एक नायाब तहसीलदार की कार्यप्रणाली इन दिनों चर्चा और विवादों के केंद्र में है। आरोप है कि उक्त नायाब तहसीलदार खुद को मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और कृषि मंत्री रामविचार नेताम का करीबी रिश्तेदार बताकर क्षेत्र में अवैध रेत उत्खनन करने वालों पर कार्रवाई करने के बजाय उनसे लाखों रुपये की वसूली करने में लगे हुए हैं। इस मामले को लेकर प्रशासनिक गलियारों से लेकर स्थानीय लोगों के बीच भारी नाराजगी देखी जा रही है।विभागीय सूत्रों का दावा है कि संबंधित तहसील क्षेत्र में लंबे समय से नदी-नालों से अवैध रेत उत्खनन का कारोबार खुलेआम जारी है। नियमों को ताक पर रखकर दिन-रात भारी मशीनों और ट्रैक्टरों के माध्यम से रेत निकाली जा रही है, लेकिन राजस्व विभाग की ओर से प्रभावी कार्रवाई नहीं की जा रही। आरोप यह भी है कि कार्रवाई के नाम पर केवल दिखावटी अभियान चलाए जाते हैं, जबकि वास्तविक संरक्षण अवैध कारोबारियों को ही दिया जा रहा है।स्थानीय लोगों का कहना है कि जब भी अवैध उत्खनन की शिकायत की जाती है, तब संबंधित तहसीलदार अपने राजनीतिक संबंधों और उच्च स्तर तक पहुंच का हवाला देकर दबाव बनाने की कोशिश करते हैं। चर्चा यह भी है कि रेत कारोबारियों से प्रतिमाह मोटी रकम वसूली कर उन्हें निर्बाध उत्खनन की छूट दी जा रही है। यदि इन आरोपों की निष्पक्ष जांच हो जाए तो करोड़ों रुपये के अवैध खेल का खुलासा हो सकता है।जानकारों के अनुसार, बिलासपुर संभाग और आसपास के क्षेत्रों में रेत माफिया लंबे समय से सक्रिय हैं, लेकिन राजनीतिक संरक्षण और विभागीय मिलीभगत के कारण उन पर सख्त कार्रवाई नहीं हो पाती। अब जब एक नायाब तहसीलदार पर ही संरक्षण और वसूली के आरोप लग रहे हैं, तो पूरे राजस्व तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े होने लगे हैं।गौरतलब है कि प्रदेश सरकार लगातार भ्रष्टाचार और अवैध उत्खनन पर सख्ती की बात करती रही है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय स्वयं कई मंचों से पारदर्शिता और सुशासन की बात कह चुके हैं। ऐसे में यदि कोई अधिकारी मुख्यमंत्री और मंत्री का नाम लेकर अवैध कारोबारियों को संरक्षण देने का प्रयास कर रहा है, तो यह सरकार की छवि को भी नुकसान पहुंचाने वाला मामला माना जा रहा है।अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या जिला प्रशासन और राज्य शासन इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराएंगे? क्या अवैध रेत उत्खनन और कथित वसूली तंत्र पर कार्रवाई होगी, या फिर मामला राजनीतिक प्रभाव के चलते दबा दिया जाएगा? जनता की निगाहें अब शासन-प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हुई हैं।