ऑनलाइन में “नस्तीबद्ध”, जमीन पर लंबित: राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल।

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तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ के राजस्व विभाग में लंबित प्रकरणों का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। तहसीलदार, अतिरिक्त तहसीलदार और नायब तहसीलदार कार्यालयों में नामांतरण, बंटवारा, सीमांकन, ऋण पुस्तिका सुधार, डायवर्सन, कब्जा विवाद और राजस्व अभिलेख संशोधन जैसे हजारों मामले महीनों से लंबित पड़े हैं। सबसे गंभीर बात यह बताई जा रही है कि शासन और वरिष्ठ अधिकारियों को “बेहतर प्रदर्शन” दिखाने के लिए कई मामलों को ऑनलाइन पोर्टल में “नस्तीबद्ध” या “निराकृत” दर्शाया जा रहा है, जबकि वास्तविकता में संबंधित पक्षकार आज भी न्याय और आदेश की प्रतीक्षा कर रहे हैं।ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर जिला मुख्यालय तक आम नागरिकों में इस व्यवस्था को लेकर भारी नाराजगी देखी जा रही है। लोगों का आरोप है कि ऑनलाइन रिकॉर्ड में प्रकरण समाप्त दिखने के बाद भी न तो आदेश की प्रति मिलती है और न ही जमीन पर कोई अमल होता है। कई मामलों में आवेदक महीनों तक तहसील कार्यालयों के चक्कर काटते रहते हैं, लेकिन उन्हें यह कहकर लौटा दिया जाता है कि “प्रकरण निपट चुका है”।राजस्व मामलों से जुड़े जानकारों का कहना है कि वर्तमान में विभागीय समीक्षा बैठकों में लंबित प्रकरणों की संख्या कम दिखाने का दबाव निचले स्तर तक महसूस किया जा रहा है। इसी कारण कई कार्यालयों में वास्तविक निराकरण के बजाय केवल ऑनलाइन एंट्री अपडेट कर मामलों को बंद दर्शाने की प्रवृत्ति बढ़ी है। इससे शासन की मॉनिटरिंग व्यवस्था भी सवालों के घेरे में आ गई है।स्थिति यह है कि जिन मामलों में मौके की जांच, सीमांकन या दस्तावेज परीक्षण आवश्यक है, वे भी बिना पूरी प्रक्रिया के ऑनलाइन निपटाए हुए दिखाई दे रहे हैं। इससे भविष्य में बड़े भूमि विवाद खड़े होने की आशंका बढ़ गई है। ग्रामीण क्षेत्रों में किसान और जमीन मालिक सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं, क्योंकि राजस्व रिकॉर्ड में त्रुटि या लंबित प्रक्रिया के कारण उन्हें बैंक ऋण, फसल बीमा और भूमि विक्रय जैसी प्रक्रियाओं में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।विभागीय सूत्रों के अनुसार कई तहसीलों में वर्षों पुराने प्रकरण अभी भी फाइलों में दबे हुए हैं, लेकिन पोर्टल में उनकी स्थिति “क्लोज” दिखाई देती है। इससे न केवल पारदर्शिता पर प्रश्न उठ रहे हैं, बल्कि ई-गवर्नेंस की विश्वसनीयता भी प्रभावित हो रही है। प्रशासनिक विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि ऑनलाइन डेटा और वास्तविक रिकॉर्ड का स्वतंत्र ऑडिट कराया जाए तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं।राज्य शासन ने समय-समय पर राजस्व मामलों के त्वरित निराकरण के निर्देश दिए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर अमल कमजोर दिखाई देता है। कर्मचारियों की कमी, बढ़ते प्रकरण, तकनीकी खामियां और निगरानी की कमजोर व्यवस्था भी इस संकट की बड़ी वजह मानी जा रही है। वहीं दूसरी ओर आम जनता का आरोप है कि “सुविधा शुल्क” देने वाले मामलों में तेजी दिखाई जाती है, जबकि सामान्य आवेदकों की फाइलें महीनों तक लंबित रहती हैं।अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या राजस्व विभाग केवल ऑनलाइन आंकड़ों के सहारे अपनी उपलब्धियां दिखा रहा है, या वास्तव में जनता को समयबद्ध न्याय भी मिल रहा है? जरूरत इस बात की है कि शासन सभी तहसीलों के लंबित और नस्तीबद्ध प्रकरणों की भौतिक जांच कराए, जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करे और ऐसी पारदर्शी व्यवस्था लागू करे जिससे ऑनलाइन स्थिति और वास्तविक कार्यवाही में कोई अंतर न रहे।


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