तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
बिलासपुर संभाग अंर्तगत गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही जिले के मरवाही वन मंडल में वन विकास एवं संरक्षण कार्यों में लंबे समय से कार्यरत कुछ ठेकेदारों की कार्यप्रणाली को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। विभागीय सूत्रों के अनुसार कई निर्माण एवं विकास कार्यों में गुणवत्ता, समय-सीमा और वित्तीय अनियमितताओं की शिकायतें समय-समय पर सामने आती रही हैं। ऐसे में अब निगाहें वनमंडल अधिकारी (डीएफओ) ग्रीष्मी चांद पर टिकी हुई हैं, जिन्हें विभाग में एक सख्त और पारदर्शी प्रशासनिक अधिकारी के रूप में देखा जा रहा है।वन विभाग के विभिन्न कार्यों में शासन की ओर से करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं। इनमें पौधारोपण, सुरक्षा चौकी निर्माण, वन मार्ग, तालाब, कैंपा मद के कार्य तथा अन्य विकास योजनाएं शामिल हैं। लेकिन स्थानीय स्तर पर यह चर्चा आम है कि कुछ ठेकेदार वर्षों से विभागीय कार्यों पर प्रभाव बनाए हुए हैं और उनके कार्यों की गुणवत्ता को लेकर लगातार शिकायतें मिलती रही हैं।सूत्रों का कहना है कि कई मामलों में कार्य पूर्ण होने के दावे तो किए गए, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही नजर आई। ऐसे आरोप भी लगते रहे हैं कि कुछ कार्यों में निर्धारित मानकों का पालन नहीं किया गया। हालांकि इन आरोपों की निष्पक्ष जांच होना अभी बाकी है।वनमंडल अधिकारी ग्रीष्मी चांद के कार्यभार संभालने के बाद विभागीय स्तर पर पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के प्रयासों की चर्चा है। कर्मचारियों और स्थानीय लोगों को उम्मीद है कि यदि लंबित शिकायतों और संदिग्ध कार्यों की गहन जांच कराई जाती है, तो कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं।विशेषज्ञों का मानना है कि वन विभाग जैसे संवेदनशील विभाग में विकास कार्यों की गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं होना चाहिए, क्योंकि इसका सीधा प्रभाव पर्यावरण संरक्षण और सरकारी धन के उपयोग पर पड़ता है। ऐसे में यदि किसी भी ठेकेदार द्वारा नियमों की अनदेखी या वित्तीय अनियमितता की गई है, तो उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई होना आवश्यक है।अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि मरवाही वन मंडल में वर्षों से चर्चा में रहे संदिग्ध और विवादित कार्यों की जांच कब होगी? क्या वनमंडल अधिकारी ग्रीष्मी चांद भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के आरोपों की निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई करेंगी, या फिर यह मामला भी फाइलों तक सीमित रह जाएगा?मरवाही क्षेत्र के नागरिकों और पर्यावरण प्रेमियों की नजरें अब वन विभाग की आगामी कार्रवाई पर टिकी हैं। यदि शिकायतों की पारदर्शी जांच होती है, तो इससे न केवल विभाग की कार्यप्रणाली में सुधार आएगा, बल्कि शासन की भ्रष्टाचार के प्रति “जीरो टॉलरेंस” नीति को भी मजबूती मिलेगी।