मनपसंद अफसर की पैरवी या सुशासन की नई परिभाषा? विधायक की चिट्ठी ने खड़े किए कई सवाल।

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तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

दुर्ग जिले के जनपद पंचायत दुर्ग में मुख्य कार्यपालन अधिकारी (सीईओ) को लेकर चल रहे विवाद के बीच एक पत्र ने राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है। दुर्ग ग्रामीण विधायक एवं प्रदेश के पूर्व मंत्री ललित चंद्राकर द्वारा मुख्यमंत्री को लिखे गए पत्र में न केवल वर्तमान सीईओ को हटाने की मांग की गई है, बल्कि उनकी जगह किस अधिकारी को पदस्थ किया जाए, इसका नाम भी सुझा दिया गया है। यही बात अब सवालों के घेरे में है।दरअसल, कुछ दिन पहले सुशासन तिहार के दौरान जनपद पंचायत दुर्ग के सीईओ को लेकर भाजपा कार्यकर्ताओं और जनप्रतिनिधियों ने स्वयं विधायक ललित चंद्राकर की मौजूदगी में गंभीर आपत्तियां जताई थीं। उस समय आरोप लगाए गए थे कि जनपद पंचायत का कामकाज संतोषजनक नहीं है और सीईओ के खिलाफ नाराजगी खुलकर सामने आई थी। स्वाभाविक रूप से उम्मीद थी कि विधायक प्रशासनिक सुधार और जवाबदेही की मांग करेंगे।लेकिन अब सामने आए पत्र में मामला कुछ अलग नजर आ रहा है। विधायक ने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को लिखे पत्र में विकास विस्तार अधिकारी ललित कुमार घरड़े को प्रभारी सीईओ जनपद पंचायत दुर्ग बनाने की अनुशंसा की है। पत्र में स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि श्री घरड़े वर्तमान में बलरामपुर-रामानुजगंज जिले में पदस्थ हैं और उन्हें दुर्ग जनपद पंचायत में प्रभारी मुख्य कार्यपालन अधिकारी के रूप में पदस्थ किया जाए।सवाल यह नहीं कि अधिकारी कौन बनेगा, सवाल यह है कि नाम क्यों सुझाया गया?प्रशासनिक हलकों में चर्चा है कि यदि वास्तव में वर्तमान सीईओ के कार्यों को लेकर असंतोष था तो विधायक केवल उनकी कार्यप्रणाली पर सवाल उठाकर कार्रवाई की मांग कर सकते थे। लेकिन किसी विशेष अधिकारी का नाम सुझाना यह संकेत देता है कि मामला केवल व्यवस्था सुधार का नहीं, बल्कि “पसंदीदा अधिकारी” को महत्वपूर्ण पद दिलाने की कोशिश भी हो सकता है।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी विधायक को अपने क्षेत्र में सक्षम और भरोसेमंद अधिकारियों के साथ काम करने का अधिकार है, लेकिन जब नियुक्ति या पदस्थापना के लिए सीधे नाम प्रस्तावित किए जाएं तो निष्पक्ष प्रशासन की अवधारणा पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।सुशासन तिहार में उठे सवाल, लेकिन कार्रवाई की दिशा बदली?सुशासन तिहार का उद्देश्य जनता की शिकायतों का समाधान और प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित करना बताया गया था। यदि उसी मंच पर सीईओ के खिलाफ शिकायतें उठीं, तो अपेक्षा थी कि उन शिकायतों की जांच या समीक्षा की मांग होती। मगर अब सामने आया पत्र यह संकेत दे रहा है कि विवाद का समाधान जांच या सुधार के बजाय “नए चेहरे” की पैरवी के रूप में तलाशा जा रहा है।विपक्ष को मिला नया मुद्दाइस पूरे घटनाक्रम ने विपक्ष को भी सरकार और विधायक पर सवाल उठाने का अवसर दे दिया है। सोशल मीडिया पर पत्र वायरल होने के बाद लोग टिप्पणी कर रहे हैं कि “अगर केवल सीईओ को हटाने की चिट्ठी लिखी जाती तो बात अलग थी, लेकिन किसे लाना है यह भी तय कर दिया गया।”बड़ा सवालक्या जनपद पंचायत दुर्ग में प्रशासनिक सुधार प्राथमिकता है, या फिर किसी भरोसेमंद अधिकारी को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दिलाना?क्या सुशासन तिहार में उठी शिकायतों की निष्पक्ष जांच होगी?और सबसे महत्वपूर्ण—क्या अधिकारियों की पदस्थापना योग्यता और प्रशासनिक आवश्यकता के आधार पर होगी या राजनीतिक सिफारिशों के आधार पर?इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में सरकार और प्रशासन दोनों को देने पड़ सकते हैं।


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