संपादक की कलम से…*दौ कौड़ी का सही, पर खुद्दारी करोड़ों की: राजनीति में बची रहनी चाहिए इज्जत की पूंजी।

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तरुण कौशिक,संपादक सर्वव्यापी

भारतीय राजनीति में आज एक अजीब दौर चल रहा है। सत्ता, पद, प्रभाव और अवसरों की चमक के बीच व्यक्ति की पहचान उसके सिद्धांतों से नहीं, बल्कि उसके राजनीतिक वजन और उपयोगिता से तय की जाने लगी है। ऐसे समय में यह पंक्ति— “दौ कौड़ी का हूं मैं, मगर खुद्दारी मेरी सबसे बड़ी दौलत है। कीमत कम है मेरी, पर इज्जत पूरी रखता हूं।” —सिर्फ एक व्यक्तिगत भाव नहीं, बल्कि वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य पर गहरा व्यंग्य भी है।लोकतंत्र में हर व्यक्ति की कीमत उसके पद या पैसे से नहीं, बल्कि उसके चरित्र और आत्मसम्मान से तय होती है। दुर्भाग्य से आज राजनीति में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है जो अपने स्वाभिमान को पद की सीढ़ी बनाने में संकोच नहीं करते। दल बदलना, अवसर के अनुसार विचारधारा बदल लेना, सत्ता के सामने नतमस्तक हो जाना और निजी लाभ के लिए जनहित को दरकिनार कर देना अब सामान्य राजनीतिक व्यवहार माना जाने लगा है।इसके विपरीत कुछ लोग ऐसे भी हैं जो भले ही सत्ता के केंद्र में न हों, जिनके पास संसाधनों का अंबार न हो, लेकिन वे अपने आत्मसम्मान और सिद्धांतों से समझौता नहीं करते। राजनीति के इतिहास में ऐसे ही लोगों ने समाज को दिशा दी है। उनके पास भले ही सत्ता की ताकत नहीं थी, लेकिन नैतिक शक्ति इतनी प्रबल थी कि समय ने उन्हें सम्मान दिया।आज की राजनीति में सबसे बड़ा संकट आर्थिक नहीं, नैतिक है। राजनीतिक दलों में विचारधारा का क्षरण हुआ है और व्यक्तिगत स्वार्थ सार्वजनिक जीवन पर हावी होता दिखाई देता है। ऐसे माहौल में खुद्दारी और इज्जत की बात करना कई लोगों को अव्यावहारिक लग सकता है, लेकिन लोकतंत्र की असली ताकत यही मूल्य हैं। यदि राजनीति से आत्मसम्मान और नैतिकता समाप्त हो जाए, तो लोकतंत्र केवल सत्ता प्राप्ति का खेल बनकर रह जाएगा।यह भी सच है कि समाज अक्सर व्यक्ति की आर्थिक हैसियत देखकर उसका मूल्यांकन करता है। जिनके पास धन और प्रभाव होता है, उन्हें महत्व दिया जाता है, जबकि साधारण व्यक्ति को नजरअंदाज कर दिया जाता है। लेकिन इतिहास गवाह है कि सम्मान खरीदा नहीं जा सकता। धन, पद और शक्ति क्षणिक हो सकते हैं, पर चरित्र और खुद्दारी की पहचान स्थायी होती है।आज जब राजनीति में सिद्धांतों की जगह समीकरण और मूल्यों की जगह अवसरवादिता चर्चा का विषय बन गए हैं, तब यह संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है कि व्यक्ति की असली दौलत उसकी खुद्दारी है। कोई व्यक्ति भले ही “दौ कौड़ी” का समझा जाए, लेकिन यदि उसने अपनी इज्जत और स्वाभिमान को बचाकर रखा है, तो वह उन लोगों से कहीं अधिक समृद्ध है जिन्होंने पद और लाभ के लिए अपने सिद्धांत गिरवी रख दिए।लोकतंत्र की मजबूती भी ऐसे ही लोगों पर निर्भर करती है जो सत्ता के सामने प्रश्न पूछने का साहस रखते हैं, अन्याय के खिलाफ खड़े होते हैं और अपने सम्मान को किसी भी कीमत पर बेचने को तैयार नहीं होते। राजनीति में पद का महत्व है, लेकिन उससे कहीं अधिक महत्व उस व्यक्ति का है जो पद के बिना भी सम्मानित है।आज की राजनीति को शायद इसी संदेश की सबसे अधिक आवश्यकता है— कीमत चाहे कम हो, लेकिन इज्जत पूरी होनी चाहिए; क्योंकि सत्ता की उम्र सीमित होती है, जबकि खुद्दारी की पहचान पीढ़ियों तक जीवित रहती है।


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