तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा वर्षों से विभागीय संलग्नीकरण (अटैचमेंट) की व्यवस्था पर रोक लगाने और प्रशासनिक पारदर्शिता की बात करने के बीच एक ऐसी नोटशीट सामने आई है जिसने शासन की कार्यप्रणाली को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला आयुर्वेद चिकित्सा अधिकारी डॉ. प्रीति पटले के संलग्नीकरण से जुड़ा है, जिसके लिए स्वयं उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा द्वारा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग को नोटशीट भेजकर विचार करने का आग्रह किया गया है। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि नोटशीट में स्थानांतरण नहीं बल्कि स्पष्ट रूप से “संलग्नीकरण” शब्द का प्रयोग किया गया है, जबकि राज्य में संलग्नीकरण की व्यवस्था पर पूरी तरह प्रतिबंध लागू है।प्राप्त दस्तावेज के अनुसार डॉ. प्रीति पटले वर्तमान में आयुर्वेद चिकित्सालय थनौद, जिला दुर्ग में पदस्थ हैं। उनके पति लखन पटले कोरबा जिले में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक के पद पर कार्यरत हैं। नोटशीट में पारिवारिक कठिनाइयों का उल्लेख करते हुए डॉ. प्रीति पटले को आयुष विंग जिला चिकित्सालय कोरबा अथवा शासकीय आयुष पॉली क्लिनिक कोरबा में संलग्न किए जाने का अनुरोध किया गया है। दस्तावेज में यह भी उल्लेख है कि पति-पत्नी एक ही जिले में पदस्थ रह सकें, इस आधार पर उक्त मांग पर विचार किया जाए।यहीं से पूरा मामला विवाद का विषय बन जाता है। शासन द्वारा जारी विभिन्न आदेशों में स्पष्ट किया जा चुका है कि संलग्नीकरण की व्यवस्था प्रशासनिक अव्यवस्था को जन्म देती है और इससे मूल पदस्थापना व्यवस्था प्रभावित होती है। यही कारण है कि कई विभागों में पूर्व में किए गए संलग्नीकरण समाप्त कर कर्मचारियों और अधिकारियों को मूल पदस्थापना स्थल पर लौटाया गया था। ऐसे में यदि किसी एक अधिकारी के लिए सत्ता के शीर्ष स्तर से संलग्नीकरण की विशेष अनुशंसा की जाती है तो यह स्वाभाविक रूप से सवाल उठाता है कि क्या नियम सभी के लिए समान हैं या फिर प्रभावशाली मामलों में अलग व्यवस्था लागू होती है।सरकारी कर्मचारी संगठनों के बीच भी यह नोटशीट चर्चा का विषय बनी हुई है। वर्षों से पारिवारिक, स्वास्थ्य अथवा अन्य कारणों का हवाला देकर स्थान परिवर्तन की मांग करने वाले अनेक कर्मचारी यह सवाल उठा रहे हैं कि जब संलग्नीकरण पर पूर्ण प्रतिबंध है तो फिर इस प्रकार की अनुशंसाएं किस आधार पर की जा रही हैं। कर्मचारियों का मानना है कि यदि पति-पत्नी आधार को ही प्राथमिकता देनी है तो इसके लिए स्थानांतरण नीति के तहत वैधानिक प्रक्रिया उपलब्ध है, फिर प्रतिबंधित व्यवस्था के लिए नोटशीट चलाने की आवश्यकता क्यों पड़ी।प्रशासनिक जानकारों का कहना है कि किसी भी जनप्रतिनिधि को नागरिकों और कर्मचारियों की समस्याएं शासन तक पहुंचाने का अधिकार है, लेकिन जब अनुशंसा सीधे उस व्यवस्था के लिए हो जिस पर स्वयं सरकार ने रोक लगा रखी हो, तब नीति और व्यवहार के बीच विरोधाभास स्पष्ट दिखाई देता है। यही विरोधाभास अब राजनीतिक बहस का कारण बन रहा है।विपक्षी दलों को भी यह मामला सरकार को घेरने का अवसर दे सकता है। एक ओर सरकार पारदर्शी प्रशासन, नियम आधारित व्यवस्था और समान अवसर की बात करती है, वहीं दूसरी ओर प्रतिबंधित संलग्नीकरण के लिए सत्ता के शीर्ष स्तर से नोटशीट भेजे जाने की खबरें सामने आ रही हैं। इससे यह धारणा बन रही है कि आम कर्मचारियों के लिए नियम कठोर हैं, जबकि विशेष मामलों में नियमों को लचीला बनाया जा सकता है।फिलहाल यह मामला केवल एक अधिकारी के संलग्नीकरण तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह शासन की नीति, प्रशासनिक निष्पक्षता और नियमों के समान अनुपालन से जुड़ा बड़ा प्रश्न बन गया है। अब निगाहें स्वास्थ्य विभाग पर टिकी हैं कि वह सरकार की घोषित नीति के अनुरूप निर्णय लेता है या फिर इस विशेष अनुशंसा को आधार बनाकर प्रतिबंधित व्यवस्था को अपवाद स्वरूप स्वीकार करता है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब संलग्नीकरण पर पूर्ण रोक है, तो फिर सत्ता के गलियारों से संलग्नीकरण के लिए नोटशीट क्यों चल रही है?