मुख्यमंत्री सचिवालय की चिट्ठियां बन रहीं औपचारिकता? ज्ञापनों पर कार्रवाई नहीं होने से उठे गंभीर सवाल।

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तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री सचिवालय को शासन-प्रशासन का सबसे महत्वपूर्ण और प्रभावी केंद्र माना जाता है, जहां जनता, सामाजिक संगठनों, कर्मचारी संघों तथा विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधियों द्वारा अपनी समस्याओं और मांगों को लेकर ज्ञापन सौंपे जाते हैं। इन ज्ञापनों पर त्वरित और प्रभावी कार्रवाई की अपेक्षा की जाती है, लेकिन हाल के दिनों में मुख्यमंत्री सचिवालय की कार्यप्रणाली को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं।जानकारी के अनुसार, वरिष्ठ नागरिकों, सामाजिक संगठनों और विभिन्न प्रतिनिधिमंडलों द्वारा मुख्यमंत्री सचिवालय को सौंपे गए अनेक ज्ञापन महीनों से कार्रवाई की प्रतीक्षा में पड़े हुए हैं। संबंधित विभागों तक पत्र पहुंचने के बाद भी उन पर कोई ठोस निर्णय या कार्रवाई नहीं हो रही है, जिससे आमजन और संगठन निराश दिखाई दे रहे हैं।सूत्रों के अनुसार, कई विभागीय सचिवों का मानना है कि मुख्यमंत्री सचिवालय से अवर सचिव स्तर के अधिकारियों के हस्ताक्षर से प्रतिदिन बड़ी संख्या में पत्र विभिन्न विभागों को भेजे जाते हैं। इन पत्रों को विभाग सामान्य पत्राचार की श्रेणी में रखते हैं और अधिकांश मामलों में केवल औपचारिक जवाब भेजकर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेते हैं। परिणामस्वरूप, मूल समस्या का समाधान नहीं हो पाता और ज्ञापन केवल फाइलों तक सीमित होकर रह जाते हैं।प्रशासनिक जानकारों का कहना है कि मुख्यमंत्री सचिवालय की वास्तविक प्रभावशीलता तब दिखाई देती है, जब किसी मामले को सचिवालय के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी सीधे संबंधित विभाग के सचिव, प्रमुख सचिव या अपर मुख्य सचिव को विशेष टिप्पणी के साथ भेजते हैं तथा प्रकरण की नियमित मॉनिटरिंग करते हैं। ऐसे मामलों में विभागीय स्तर पर तेजी से कार्रवाई होती है और परिणाम भी सामने आते हैं।यही कारण है कि अब यह सवाल उठने लगा है कि आखिर जनता और संगठनों द्वारा सौंपे जा रहे महत्वपूर्ण ज्ञापनों की मॉनिटरिंग मुख्यमंत्री सचिवालय स्तर पर क्यों नहीं हो रही है। यदि किसी मांग या शिकायत को मुख्यमंत्री सचिवालय ने विभाग को भेज दिया है, तो उसके निराकरण की स्थिति की समीक्षा भी की जानी चाहिए, ताकि संबंधित विभाग केवल पत्र प्राप्ति की औपचारिकता निभाकर मामले को ठंडे बस्ते में न डाल सके।प्रशासनिक हलकों में यह चर्चा भी है कि मुख्यमंत्री सचिवालय से भेजे गए हजारों पत्रों में से अधिकांश की प्रगति रिपोर्ट कभी सार्वजनिक नहीं होती। इससे यह पता ही नहीं चल पाता कि किस ज्ञापन पर क्या कार्रवाई हुई और कौन-सा मामला अब भी लंबित है। पारदर्शिता और जवाबदेही के अभाव में जनता के बीच यह धारणा बन रही है कि कई महत्वपूर्ण ज्ञापन केवल कागजी प्रक्रिया बनकर रह गए हैं।विशेषज्ञों का मानना है कि मुख्यमंत्री सचिवालय को केवल पत्र अग्रेषित करने की भूमिका तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि प्रत्येक महत्वपूर्ण प्रकरण की समय-समय पर समीक्षा कर संबंधित विभागों से जवाबदेही भी तय करनी चाहिए। इससे शासन की विश्वसनीयता बढ़ेगी और जनता को यह भरोसा मिलेगा कि उनकी समस्याएं वास्तव में शासन के एजेंडे में शामिल हैं।बढ़ते असंतोष और लंबित मामलों को देखते हुए अब आवश्यकता इस बात की है कि मुख्यमंत्री सचिवालय में पदस्थ वरिष्ठ अधिकारी ज्ञापनों के निस्तारण की व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाएं, विभागों से नियमित फॉलोअप लें और यह सुनिश्चित करें कि जनता की अपेक्षाएं केवल फाइलों में कैद होकर न रह जाएं। मुख्यमंत्री की मंशा और जनहितकारी शासन की अवधारणा को धरातल पर उतारने के लिए सचिवालय स्तर पर सक्रिय निगरानी और जवाबदेही तय करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गई


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