तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ में नगरीय निकायों में एल्डरमैन नियुक्तियों को लेकर एक बार फिर राजनीतिक और प्रशासनिक सवाल खड़े हो गए हैं। विशेष रूप से मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के गृह जिले में कथित तौर पर पांच लाख रुपये लेकर एल्डरमैन बनाए जाने के आरोप, एक जिले में उपसरपंच को एल्डरमैन नियुक्त किए जाने की चर्चा, तथा एजाज ढेबर के करीबी बताए जा रहे एक कांग्रेस कार्यकर्ता को एल्डरमैन नियुक्त किए जाने के दावों ने राज्य की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि स्वयं नगरीय प्रशासन एवं विकास मंत्री अरुण साव के गृह संभाग बिलासपुर में ही एल्डरमैन नियुक्तियां लंबित हैं, जबकि अन्य स्थानों पर नियुक्तियों को लेकर विवाद सामने आ रहे हैं।लोकतांत्रिक व्यवस्था में एल्डरमैन की नियुक्ति केवल राजनीतिक समायोजन का विषय नहीं होती, बल्कि यह स्थानीय निकायों में अनुभवी और योग्य व्यक्तियों की भागीदारी सुनिश्चित करने का माध्यम भी मानी जाती है। ऐसे में यदि नियुक्तियों की प्रक्रिया पर आर्थिक लेन-देन, राजनीतिक निष्ठा या पक्षपात के आरोप लगते हैं, तो इससे न केवल सरकार की साख प्रभावित होती है, बल्कि पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर भी प्रश्नचिह्न खड़े होते हैं।यह भी चिंताजनक है कि यदि विपक्षी दल से जुड़े व्यक्तियों या उनके करीबी लोगों को एल्डरमैन बनाया गया है, तो सरकार और सत्तारूढ़ संगठन के बीच समन्वय की स्थिति पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है। क्या नियुक्तियों में स्थानीय संगठन की अनुशंसा को महत्व दिया गया? क्या पात्रता और योग्यता के स्पष्ट मापदंड अपनाए गए? और यदि नहीं, तो इसके लिए जवाबदेह कौन है?विशेष रूप से तब, जब सरकार “सुशासन” और “पारदर्शिता” को अपनी प्राथमिकता बताती रही हो, ऐसे आरोपों का गंभीरता से परीक्षण होना आवश्यक हो जाता है। यदि मुख्यमंत्री के गृह जिले तक में नियुक्तियों को लेकर आर्थिक लेन-देन की चर्चाएं सार्वजनिक हो रही हैं, तो यह केवल एक जिले का मामला नहीं रह जाता, बल्कि पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता का प्रश्न बन जाता है।हालांकि, यह भी उतना ही आवश्यक है कि किसी भी आरोप को अंतिम सत्य मानने से पहले उसकी निष्पक्ष जांच हो। लोकतंत्र में आरोपों की जांच तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर ही होनी चाहिए। यदि आरोप निराधार हैं, तो सरकार को स्पष्ट रूप से स्थिति सार्वजनिक करनी चाहिए, और यदि आरोपों में सत्यता है, तो दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई सुनिश्चित करनी चाहिए।आज आवश्यकता इस बात की है कि राज्य सरकार एल्डरमैन नियुक्तियों की पूरी प्रक्रिया को सार्वजनिक करे, चयन के मानदंडों को स्पष्ट करे और यह बताए कि किन आधारों पर किन व्यक्तियों को नियुक्त किया गया। इससे न केवल विवादों का समाधान होगा, बल्कि जनता का विश्वास भी मजबूत होगा।अंततः, यह मामला केवल एल्डरमैन नियुक्तियों का नहीं है, बल्कि शासन की पारदर्शिता, राजनीतिक नैतिकता और संगठनात्मक जवाबदेही का भी है। सरकार के सामने चुनौती केवल आरोपों का खंडन करने की नहीं, बल्कि जनता के विश्वास को कायम रखने की है। यदि इस अवसर पर पारदर्शिता और जवाबदेही का परिचय दिया जाता है, तो यह लोकतंत्र को मजबूत करेगा; अन्यथा ऐसे विवाद सरकार और संगठन दोनों के लिए दीर्घकालिक राजनीतिक नुकसान का कारण बन सकते हैं।