तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री दिवंगत अजीत जोगी के गृह जिला गौरेला पेंड्रा मरवाही जिले के मरवाही वनमंडल में कैम्पा एवं ग्रीन क्रेडिट योजना के अंतर्गत कराए गए पौधारोपण कार्यों की जांच अब केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह गई है, बल्कि यह पूरे वन विभाग की कार्यप्रणाली, वित्तीय पारदर्शिता और जांच की निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करने वाला मामला बनता जा रहा है।वनमंडलाधिकारी ग्रीष्मी चांद द्वारा 24 जून 2026 को प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख को भेजे गए विस्तृत प्रतिवेदन में ऐसे कई तथ्य सामने रखे गए हैं, जिनसे संकेत मिलता है कि जांच समिति द्वारा महत्वपूर्ण वित्तीय अनियमितताओं की अनदेखी की गई, जबकि उन अनियमितताओं की जानकारी स्वयं डीएफओ ने समय रहते अपने वरिष्ठ अधिकारियों और जांच समिति को उपलब्ध कराई थी।प्रतिवेदन के अनुसार, वर्ष 2024-25 में सधवानी रोपणी के अंतर्गत ग्रीन क्रेडिट योजना में पौधा तैयारी कार्य के दौरान 30×45 आकार के पॉलीबैग मिश्रण एवं भराई का एक ही कार्य दो अलग-अलग अवधियों में प्रमाणित कर भुगतान कराया गया। मार्च तथा जुलाई 2025 के प्रमाणकों के आधार पर मई 2025 में लगभग 20.87 लाख रुपये तथा उसी कार्य के लिए अक्टूबर 2025 में पुनः लगभग 18.63 लाख रुपये का भुगतान भारित किया गया। डीएफओ ने इसे शासन को लगभग 18.63 लाख रुपये की संभावित वित्तीय क्षति बताते हुए गंभीर वित्तीय अनियमितता की श्रेणी में रखा है।प्रतिवेदन में उल्लेख है कि इस अनियमितता की जानकारी मिलते ही तत्कालीन परिक्षेत्र अधिकारी एवं रोपणी प्रभारी के विरुद्ध कारण बताओ नोटिस जारी करने का प्रस्ताव मुख्य वन संरक्षक को भेजा गया तथा संबंधित रोपणी सहायक के विरुद्ध भी कार्रवाई प्रारंभ कर दी गई। इससे यह संकेत मिलता है कि वर्तमान डीएफओ ने अनियमितताओं को छिपाने के बजाय स्वयं उन्हें चिन्हित कर विभागीय कार्रवाई शुरू की।डीएफओ ने अपने पत्र में यह भी कहा है कि वन संरक्षक गुरूनाथन एन. की अध्यक्षता वाली जांच समिति को कई बार मौखिक एवं लिखित रूप से वास्तविक स्थिति से अवगत कराया गया, किन्तु अंतिम जांच प्रतिवेदन में उन तथ्यों को अपेक्षित महत्व नहीं दिया गया। उनका आरोप है कि जांच समिति ने केवल दस्तावेजों के आधार पर निष्कर्ष निकाल लिए, जबकि संबंधित नर्सरियों एवं रोपण स्थलों का समुचित स्थल निरीक्षण नहीं किया गया।प्रतिवेदन में विशेष रूप से चिचगोहना एवं सधवानी रोपणियों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि समिति ने यह मान लिया कि 15×25 आकार के दोने में पौधा तैयारी नहीं हुई, जबकि उपलब्ध प्राक्कलन, अभिलेख एवं वास्तविक स्थिति इसके विपरीत हैं। डीएफओ का कहना है कि केवल कागजी परीक्षण के आधार पर सामग्री को “निरर्थक व्यय” घोषित करना उचित नहीं है, जब तक मौके पर जाकर पौधों एवं नर्सरी की वास्तविक स्थिति का परीक्षण न कर लिया जाए।पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि जांच समिति ने पूर्व जांच प्रतिवेदन में मनरेगा के लगभग 59 हजार पौधों को भी संज्ञान में नहीं लिया और उन्हें बिना पर्याप्त परीक्षण के “टॉल प्लांट” मान लिया। डीएफओ का कहना है कि यह निष्कर्ष प्राक्कलन और अभिलेखों से मेल नहीं खाता।वनमंडलाधिकारी ने विधानसभा में उठाए गए उस महत्वपूर्ण विषय का भी उल्लेख किया है, जिसमें चिचगोहना रोपणी प्रबंधन समिति के लगभग 80 हजार पौधों तथा ग्रीन क्रेडिट एवं कैम्पा योजना के अंतर्गत लगभग 1.35 लाख पौधों के उपयोग एवं भुगतान का मामला उठाया गया था। उनका आरोप है कि इस गंभीर विषय को भी जांच समिति ने अपने निष्कर्षों में समुचित स्थान नहीं दिया।अपने प्रतिवेदन में डीएफओ ने यह भी बताया कि उन्होंने स्वयं एक स्वतंत्र जांच टीम गठित कर दोनों प्रमुख रोपणियों का भौतिक सत्यापन कराया। जांच रिपोर्ट के अनुसार लक्ष्य से अतिरिक्त 99,449 पौधे उपलब्ध पाए गए। इसके अतिरिक्त अन्य वनमंडलों से 63,166 पौधे प्राप्त होने का भी उल्लेख किया गया है, जिससे यह संकेत मिलता है कि पौधों की उपलब्धता को लेकर भी जांच समिति के निष्कर्षों और वास्तविक स्थिति में अंतर हो सकता है।डीएफओ ने अपने पत्र में यह भी स्पष्ट किया है कि जिस अवधि में पौधा तैयारी का कार्य हुआ, उस समय वे मरवाही वनमंडल में पदस्थ नहीं थीं। उन्होंने 30 अप्रैल 2025 के बाद कार्यभार ग्रहण किया और अधिकांश कार्य तत्कालीन वनमंडलाधिकारी रौनक गोयल के कार्यकाल में संपन्न हुए थे। ऐसे में उनके अनुसार जांच के दौरान तत्कालीन और वर्तमान दोनों वनमंडलाधिकारियों का पक्ष लेना आवश्यक था, जो नहीं लिया गया।पत्र में पूर्व मुख्य वन संरक्षक द्वारा की गई प्रतिकूल टिप्पणी, उसके बाद गठित जांच समिति तथा उसके कार्य करने के तरीके पर भी गंभीर आपत्तियां दर्ज की गई हैं। डीएफओ का कहना है कि जांच में सभी महत्वपूर्ण दस्तावेज, संबंधित अधिकारियों के कथन तथा उपलब्ध साक्ष्यों का समुचित परीक्षण नहीं किया गया, जिससे पूरी जांच एकपक्षीय प्रतीत होती है।उन्होंने यह भी कहा है कि उनके द्वारा समय-समय पर जो वित्तीय अनियमितताएं उजागर की गईं, उन्हें जांच समिति ने पर्याप्त महत्व नहीं दिया। इसके विपरीत उन्हीं तथ्यों की अनदेखी कर अधूरे निष्कर्ष निकाले गए, जिससे वास्तविक दोषियों तक पहुंचने के बजाय जांच की दिशा ही बदलती दिखाई देती है।वन विभाग के जानकारों का मानना है कि यदि डीएफओ द्वारा प्रस्तुत दस्तावेज, भुगतान विवरण, प्रमाणक तथा स्वतंत्र जांच रिपोर्ट सही पाई जाती है, तो यह मामला केवल प्रशासनिक लापरवाही तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि करोड़ों रुपये की योजनाओं के वित्तीय प्रबंधन और जांच प्रणाली की विश्वसनीयता पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करेगा।अब विभागीय स्तर पर सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख इस विस्तृत प्रतिवेदन में उठाए गए प्रत्येक बिंदु की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराएंगे, या फिर डीएफओ द्वारा इंगित की गई वित्तीय अनियमितताओं और जांच प्रक्रिया पर लगाए गए आरोप भी विभागीय फाइलों तक ही सीमित रह जाएंगे।


